ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजिस भांति माली संपन्न । जड़को सींचता अर्जुन । फलमें उसका दर्शन । करता है फिर ॥ ४४ ॥ वैसे शास्त्रानुसार आचरण । कर करना ईश्वर दर्शन । यही एक निश्चय अर्जुन । करना ज्ञान है ॥ ४५ ॥ ब्राह्मण कर्ममें ज्ञान । सातवा गुण है जान । विज्ञानका रूप सुन । कहता अब ॥ ४६ ॥ अंतःकरण शुद्धिके समय । शास्त्रका ध्यान बलसे विलय । ईश्वर तत्वमें होना निश्चय । बुद्धिका जान ॥ ४७ ॥ वास्तविक यह विज्ञान । आठवा है जो गुणरत्न । तथा आस्तिक्य भी सुन । गुण है नौवा ॥ ४८ ॥ राज-मुद्रा जिसके पास होती । जनता उसीको है मान देती । सच्छात्रोंसे जो भी स्वीकार होती । उसी राहको ॥ ४९ ॥ अति आदरसे जो मानता । उसीको मैं आस्तिक्य कहता । उसे नौवा गुण मैं कहता । इस स्थानपे ॥ ८५० ॥ ऐसे शमदमादिक । गुण हैं नौ निर्दोष । कर्म जान स्वाभाविक । ब्राह्मणके ये ॥ ५१ ॥ यह नौ गुण-रत्नाकर । या नवरत्नोंका है हार । प्रकाशको जैसे भास्कर । धारण करता ॥ ५२ ॥ या चंपक पुष्पसे चंपा पूजता । या चांदनीसे ही चंद्र उजलता । अथवा चंदन निजको चर्चिता । सौरभसे अपने ॥ ५३ ॥ नौ गुणोंका जड़ावू भूषण । धारण करता जो ब्राह्मण । कभी न छोड़ता तन मन । ब्राह्मणका उसे ॥ ५४ ॥ अब क्षत्रियको जो उचित । कर्म कहता तुझे निश्चित । बुद्धि सह तू देकर चित्त । सुन तू अब ॥ ५५ ॥ क्षत्रियोंका स्वभाव-धर्म— तेजमें कभी किसीका भानु । सहाय न चाहता अर्जुन । शिकारीमें सिंह कभी न- । चाहता सहाय ॥ ५६ ॥ ज्ञानेश्वरी ७८६