भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 857

शमो दमस्तपः शौचं क्षांतिरार्जवमेव च । ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥ ४२ ॥ ब्राह्मणोंका स्वभाव धर्म— बुद्धिका जो ऐसे उपराम । इसके साथ जान तू राम । यह गुणोंका है उपक्रम । जिन कर्मोंमें ॥ ३४ ॥ बाह्य इंद्रियोंका यह जो झुंड । होता है धर्म-विरुद्ध उदंड । तब रोक लेता जो विधि-दंड । वही है दम ॥ ३५ ॥ करता जो शममें सहाय । वह गुण दम धनंजय । यह दूसरे गुणका कार्य । ब्रह्मकर्ममें ॥ ३६ ॥ जैसे है छठीकी रात । नहीं भूलते हैं ज्योत । वैसे ईश्वरकी बात । चितमें रखना ॥ ३७ ॥ इसका नाम है तप । तीसरे गुणका रूप । वैसे शौच भी निष्पाप । द्विविध यहां ॥ ३८ ॥ भावशुद्धिसे भरा हुवा मन । विहित कर्मसे भूषित तन । ऐसे जिसका सबाह्य जीवन । सजा हुवा है ॥ ३९ ॥ इसका नाम शौच है पार्था । ब्राह्मण-कर्मका गुण चौथा । तथा पृथ्वीके भांति सर्वथा । सभी सहना ॥ ८४० ॥ इसका नाम पांडव । गुण है कहा पांचवा । स्वरमें जैसे सुहाव । पंचम स्वर ॥ ४१ ॥ तथा टेडेमेडे किनारोंसे । सरल बहती गंगा जैसे । अथवा टेडे ईखमें जैसे । रहता रस सरल ॥ ४२ ॥ विश्वमें जीवोंके विषयमें । सरलतासे बरतनेमें । दीखता गुण जो कर्ममें । आर्जव है छटा ॥ ४३ ॥ तप शांति क्षमा श्रद्धा ज्ञान विज्ञान निग्रह । ऋजुता और पावित्र्य ब्रह्मकर्म स्वभावसे ॥ ४२ ॥ (४७) ७८५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग