ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवृत्तिका निकट संबंध । ब्राह्मणादिसे होता सिद्ध । उससे शूद्र जो प्रसिद्ध । हुवा चौथा ॥ २१ ॥ जैसे फूलोंके साथ ही साथ । सूत्रकी गंध लेते श्रीमंत । द्विज संग शूद्रको भी पार्थ । स्वीकारते वेद ॥ २२ ॥ ऐसी है अजी पार्था । चातुर्वर्ण्य व्यवस्था । दिखाऊं कर्म पथ । इसका मैं ॥ २३ ॥ जिन गुणोंसे ये वर्ण हैं चार । जन्म-मृत्यू कैंचीसे छूटकर । ईश्वरके निकट धनुर्धर । पहुंचेंगे ही ॥ २४ ॥ जिस आत्म-प्रकृतिने यहां । सत्वा दिक गुणोंमें है जहां । लोगोंको ये चार कर्म यहां । बांट दिये हैं ॥ २५ ॥ पिताने बांटा जैसे जो संचित धन । सूर्यने राहीको पथ दिखाया जान । या उनके कर्म सेवकोंको अर्जुन । दिखाये हैं स्वामीने ॥ २६ ॥ इस भांति प्रवृत्तिने गुण । फैलाकर किये चार वर्ण । कर्म रूपसे जान अर्जुन । किया विस्तार ॥ २७ ॥ यहां तू सत्व-गुणसे जान । कम अधिक मिश्रण बन । हुवा इन दोनोंका नियोजन । ब्राह्मण क्षत्रिय ॥ २८ ॥ तथा है जो रज सात्विक । उससे रचे वैश्य लोक । रज तम मिलाके देख । हुए शूद्र ॥ २९ ॥ ऐसा एकही प्राणि वृंद । किया चतुवर्ण भेद । सुन वह गुण प्रबुद्ध । पांडुकुमार ॥ ८३० ॥ किया आप रखा जो जैसे । दीप-ज्योत दिखाती जैसे । गुण भिन्न कर्म भी वैसे । दिखाते शास्त्र ॥ ३१ ॥ वैसे अब कौन कौन । वर्ण विहित लक्षण । कहता कर श्रवण । सौभाग्य निधि तू ॥ ३२ ॥ सर्वेंद्रियोंकी सभी प्रवृत्तियां । अपने हाथमें ले धनंजया । बुद्धि मिलती है आत्मासे प्रिया । पतिव्रता जैसे ॥ ३३ ॥ ज्ञानेश्वरी ७८४