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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

वृत्तिका निकट संबंध । ब्राह्मणादिसे होता सिद्ध । उससे शूद्र जो प्रसिद्ध । हुवा चौथा ॥ २१ ॥ जैसे फूलोंके साथ ही साथ । सूत्रकी गंध लेते श्रीमंत । द्विज संग शूद्रको भी पार्थ । स्वीकारते वेद ॥ २२ ॥ ऐसी है अजी पार्था । चातुर्वर्ण्य व्यवस्था । दिखाऊं कर्म पथ । इसका मैं ॥ २३ ॥ जिन गुणोंसे ये वर्ण हैं चार । जन्म-मृत्यू कैंचीसे छूटकर । ईश्वरके निकट धनुर्धर । पहुंचेंगे ही ॥ २४ ॥ जिस आत्म-प्रकृतिने यहां । सत्वा दिक गुणोंमें है जहां । लोगोंको ये चार कर्म यहां । बांट दिये हैं ॥ २५ ॥ पिताने बांटा जैसे जो संचित धन । सूर्यने राहीको पथ दिखाया जान । या उनके कर्म सेवकोंको अर्जुन । दिखाये हैं स्वामीने ॥ २६ ॥ इस भांति प्रवृत्तिने गुण । फैलाकर किये चार वर्ण । कर्म रूपसे जान अर्जुन । किया विस्तार ॥ २७ ॥ यहां तू सत्व-गुणसे जान । कम अधिक मिश्रण बन । हुवा इन दोनोंका नियोजन । ब्राह्मण क्षत्रिय ॥ २८ ॥ तथा है जो रज सात्विक । उससे रचे वैश्य लोक । रज तम मिलाके देख । हुए शूद्र ॥ २९ ॥ ऐसा एकही प्राणि वृंद । किया चतुवर्ण भेद । सुन वह गुण प्रबुद्ध । पांडुकुमार ॥ ८३० ॥ किया आप रखा जो जैसे । दीप-ज्योत दिखाती जैसे । गुण भिन्न कर्म भी वैसे । दिखाते शास्त्र ॥ ३१ ॥ वैसे अब कौन कौन । वर्ण विहित लक्षण । कहता कर श्रवण । सौभाग्य निधि तू ॥ ३२ ॥ सर्वेंद्रियोंकी सभी प्रवृत्तियां । अपने हाथमें ले धनंजया । बुद्धि मिलती है आत्मासे प्रिया । पतिव्रता जैसे ॥ ३३ ॥ ज्ञानेश्वरी ७८४

शमो दमस्तपः शौचं क्षांतिरार्जवमेव च । ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥ ४२ ॥ ब्राह्मणोंका स्वभाव धर्म— बुद्धिका जो ऐसे उपराम । इसके साथ जान तू राम । यह गुणोंका है उपक्रम । जिन कर्मोंमें ॥ ३४ ॥ बाह्य इंद्रियोंका यह जो झुंड । होता है धर्म-विरुद्ध उदंड । तब रोक लेता जो विधि-दंड । वही है दम ॥ ३५ ॥ करता जो शममें सहाय । वह गुण दम धनंजय । यह दूसरे गुणका कार्य । ब्रह्मकर्ममें ॥ ३६ ॥ जैसे है छठीकी रात । नहीं भूलते हैं ज्योत । वैसे ईश्वरकी बात । चितमें रखना ॥ ३७ ॥ इसका नाम है तप । तीसरे गुणका रूप । वैसे शौच भी निष्पाप । द्विविध यहां ॥ ३८ ॥ भावशुद्धिसे भरा हुवा मन । विहित कर्मसे भूषित तन । ऐसे जिसका सबाह्य जीवन । सजा हुवा है ॥ ३९ ॥ इसका नाम शौच है पार्था । ब्राह्मण-कर्मका गुण चौथा । तथा पृथ्वीके भांति सर्वथा । सभी सहना ॥ ८४० ॥ इसका नाम पांडव । गुण है कहा पांचवा । स्वरमें जैसे सुहाव । पंचम स्वर ॥ ४१ ॥ तथा टेडेमेडे किनारोंसे । सरल बहती गंगा जैसे । अथवा टेडे ईखमें जैसे । रहता रस सरल ॥ ४२ ॥ विश्वमें जीवोंके विषयमें । सरलतासे बरतनेमें । दीखता गुण जो कर्ममें । आर्जव है छटा ॥ ४३ ॥ तप शांति क्षमा श्रद्धा ज्ञान विज्ञान निग्रह । ऋजुता और पावित्र्य ब्रह्मकर्म स्वभावसे ॥ ४२ ॥ (४७) ७८५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

जिस भांति माली संपन्न । जड़को सींचता अर्जुन । फलमें उसका दर्शन । करता है फिर ॥ ४४ ॥ वैसे शास्त्रानुसार आचरण । कर करना ईश्वर दर्शन । यही एक निश्चय अर्जुन । करना ज्ञान है ॥ ४५ ॥ ब्राह्मण कर्ममें ज्ञान । सातवा गुण है जान । विज्ञानका रूप सुन । कहता अब ॥ ४६ ॥ अंतःकरण शुद्धिके समय । शास्त्रका ध्यान बलसे विलय । ईश्वर तत्वमें होना निश्चय । बुद्धिका जान ॥ ४७ ॥ वास्तविक यह विज्ञान । आठवा है जो गुणरत्न । तथा आस्तिक्य भी सुन । गुण है नौवा ॥ ४८ ॥ राज-मुद्रा जिसके पास होती । जनता उसीको है मान देती । सच्छात्रोंसे जो भी स्वीकार होती । उसी राहको ॥ ४९ ॥ अति आदरसे जो मानता । उसीको मैं आस्तिक्य कहता । उसे नौवा गुण मैं कहता । इस स्थानपे ॥ ८५० ॥ ऐसे शमदमादिक । गुण हैं नौ निर्दोष । कर्म जान स्वाभाविक । ब्राह्मणके ये ॥ ५१ ॥ यह नौ गुण-रत्नाकर । या नवरत्नोंका है हार । प्रकाशको जैसे भास्कर । धारण करता ॥ ५२ ॥ या चंपक पुष्पसे चंपा पूजता । या चांदनीसे ही चंद्र उजलता । अथवा चंदन निजको चर्चिता । सौरभसे अपने ॥ ५३ ॥ नौ गुणोंका जड़ावू भूषण । धारण करता जो ब्राह्मण । कभी न छोड़ता तन मन । ब्राह्मणका उसे ॥ ५४ ॥ अब क्षत्रियको जो उचित । कर्म कहता तुझे निश्चित । बुद्धि सह तू देकर चित्त । सुन तू अब ॥ ५५ ॥ क्षत्रियोंका स्वभाव-धर्म— तेजमें कभी किसीका भानु । सहाय न चाहता अर्जुन । शिकारीमें सिंह कभी न- । चाहता सहाय ॥ ५६ ॥ ज्ञानेश्वरी ७८६

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् । दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥ ४३ ॥ ऐसे जो स्वाभाविक सशक्त । सहाय बिन उद्भट पार्थ । ऐसे श्रेष्ठ शौर्य विकसित । गुण है प्रथम ॥ ५७ ॥ तथा जैसे सूर्यका प्रताप । कोटि नक्षत्र करता लोप । किंतु उनसे न होता लोप । चंद्र सह भी वे हो तो ॥ ५८ ॥ ऐसे प्रौढ गुणमें पार्थ । विश्वको करता विस्मित । किंतु आप न विचलित । होता है कभी ॥ ५९ ॥ ऐसा प्रगल्भ रूप जो तेज । क्षात्र-धर्मका गुण है दूजा । इसी भांति धैर्य है सहज । गुण तीसरा ॥ ८६० ॥ टूट पडा भी यदि आकाश । बुद्धिकी आंखें कभी मानुस । मिटता नहीं है स-साहस । वही है धैर्य ॥ ६१ ॥ तथा पानी कितना ही गहरा होता । कमल ऊपर आकर ही खिलता । या आकाश किसीसे नहीं हारता । ऊंचाईमें कभी ॥ ६२ ॥ कैसी ही विवश अवस्था । जीवनमें पाकर पार्था । न छेदती प्रज्ञा सर्वथा । स्थिर बुद्धिकी ॥ ६३ ॥ ऐसी दक्षता है जो चोख । यह है चौथा गुण देख । तथा जूझ जो अलौकिक । गुण पांचवा ॥ ६४ ॥ जैसे सूर्यमुखीका पुष्पक । सदा सूर्यकी ओर उन्मुख । वैसे वह शत्रुके सन्मुख । होता है सदा ॥ ६५ ॥ यत्न-पूर्वक गर्भिणी जैसे । टालती है पुरुषको वैसे । समरमें पीठ दिखानेसे । बचता रहता ॥ ६६ ॥ क्षत्रियोंका यह आचार । पांचवा गुणेंद्र धनुर्धर । पुरुषार्थीके सिरपर । भक्ति है जैसे ॥ ६७ ॥ शौर्य धैर्य प्रजा रक्षा युद्धमें अपलायन । दातृत्व दक्षता तेज क्षात्र-धर्म स्वभावसे ॥ ४३ ॥ ७८७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

लगे हुए अपने फल फूल । देनेमें वृक्ष उदार सरल । अथवा देता जैसा परिमल । कमलवन ॥ ६८ ॥ जितना जो चाहता उतना । चंद्रका उसे चांदनी देना । वैसे चाहनेवालेको देना । इच्छानुसार ॥ ६९ ॥ ऐसा अपरमित दान । जहां है छटा गुण रत्न । तथा आज्ञाका एक स्थान । होता है सदा ॥ ८७० ॥ करके अवयवोंका पोषण । उनसे सेवा लेता अनुदिन । ऐसे करके प्रजानुरंजन । भोगना प्रजासुख ॥ ७१ ॥ उसका नाम है ईश्वर-भाव । सब सामर्थ्यका है वही ठाव । सब गुणोंमें यह महाराव । क्षत्रियोंके ॥ ७२ ॥ ऐसे हैं शौर्यादि सात गुण । जिससे हैं विशेष भूषण । सप्त ऋषीसे शोभता गगन । वैसे ही है यह ॥ ७३ ॥ सात गुणोंसे जो विचित्र । विश्वमें है कर्म पवित्र । यह जान सहज क्षात्र- । धर्म है क्षत्रियोंका ॥ ७४ ॥ ऐसे क्षत्रिय नहीं है नर । स्वत्व-स्वर्णका मेरु डोंगर । तमी है स्वर्गके वे आधार । गुण है सात ॥ ७५ ॥ अथवा जो सात गुणार्णव । घेरे हैं पृथ्वि सह वैभव । भोगता है क्षत्रिय पांडव । इस प्रकार ॥ ७६ ॥ अथवा है इस गुण-प्रवाहसे । क्रिया-गंगा उसके अंगमें जैसे । मिलके जगमें महा सागरसे । शोभती है ॥ ७७ ॥ किंतु यह रहने दे देख । शौर्यादिक जो हैं गुणात्मक । सात कर्म हैं जो स्वाभाविक । क्षत्रिय जनके ॥ ७८ ॥ अब जो वैश्यको उचित । गुण कहता जो निश्चित । उनको सुन अब पार्थ । ध्यान पूर्वक ॥ ७९ ॥ वैश्य तथा शूद्रोंका कर्म— भूमि बीज और हल । इसका लेकर बल । जोड़ना लाभ अतुल । जिनका काम ॥ ८८० ॥ ज्ञानेश्वरी ७८८

अध्याय १४: गुणत्रयविभागयोग

कृषिगोरक्षवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् । परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥ ४४ ॥ अथवा कृषिसे है जीना । गोधनकी रक्षा करना । अधिक मूल्यमें बेचना । स्वस्त वस्तु ॥ ८१ ॥ इतना ही है धनंजय । वैश्य-कर्मका समुदाय । वैश्यका गुण-समुच्चय । इतना जान ॥ ८२ ॥ तथा वैश्य क्षत्रिय ब्राह्मण । द्विजन्मके हैं ये तीनों वर्ण । इन सबका जो शुश्रूषण । कर्म है शूद्रका ॥ ८३ ॥ द्विज-सुश्रूषासे पर । शूद्र कर्म ना यहांपर । वर्णोचित है धनुर्धर । दिखाये कर्म ॥ ८४ ॥ स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः । स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विंदति तच्छृणु ॥ ४५ ॥ वर्णानुसार सहज कर्म ही अधिकार है— भिन्न भिन्न वर्णोंको उचित । कर्म इसी प्रकार हैं पार्थ । जैसे इंद्रियोंको है उचित । शब्दादिक विषय ॥ ८५ ॥ अथवा मेघसे जो चूता । पानीको उचित सरिता । सरिताको है पांडुसुता । उचित है सिंधु ॥ ८६ ॥ वर्णाश्रम वश जैसे । करणीय कार्य ऐसे । गोरेकी गौरता जैसे । होती स्वाभाविक ॥ ८७ ॥ वह है जो स्वाभाविक कर्म । शास्त्रानुसार ही वीरोत्तम । करनेमें ही उत्कट प्रेम । ऐसे रहता ॥ ८८ ॥ खेती व्यापार गोरक्षा वैश्यकर्म स्वभावसे । करना प्राप्त सेवा जो शूद्र-कर्म स्वभावसे ॥ ४४ ॥ जो है स्व-कर्ममें दक्ष पाता है मोक्ष निश्चित । मोक्ष कैसा सुनो पाता स्वकर्म दक्ष जो नर ॥ ४५ ॥ ७८९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

होता है यदि अपना ही रत्न । कराता जौहरीसे परीक्षण । वैसे शास्त्रानुसार निरीक्षण । करना कर्मका ॥ ८९ ॥ जैसे दृष्टि होती है अपने पास । दीपके बिन उपयोग न खास । या पथ नहीं जानने पर विशेष । जैसे हैं पैर ॥ ८९० ॥ तभी जो है वर्णानुसार । सहज होता अधिकार । आप हो शास्त्रोंसे गोचर । करता आप ॥ ९१ ॥ जो है घरकी ही धरोहर । दीप दिखाता है धनुर्धर । उठानेमें कह तू फिर । आलस कैसे ॥ ९२ ॥ स्वाभाविक ही जो पाया । शास्त्रोंसे सही कहा गया । विहित कर्म अपनाया । आचरणमें जो ॥ ९३ ॥ आलसको छोड़कर । फलाशाको तज कर । तन मन एक कर । देना आरंभमें ॥ ९४ ॥ प्रवाह-बद्ध होकर बहता । पानी भिन्न दिशामें नहीं जाता । वैसे ही शास्त्रोचित आचरता । अपना कर्म ॥ ९५ ॥ इस प्रकारसे जो पार्थ । स्वयं कर्म करता विहित । करता है मोक्ष-द्वार प्राप्त । इस ओरका ॥ ९६ ॥ अकरणीय और निषिद्ध । कर्मसे न रखना संबंध । तभी तो वह भव-बद्ध । नहीं होता ॥ ९७ ॥ शास्त्रोक्त निष्काम कर्मसे आत्म-ज्ञान मिलता है— तथा काम्य-कर्मकी ओर । दृष्टिपात भी नहीं कर । स्वर्गका भी चंदन-द्वार । रोकता वह ॥ ९८ ॥ वैसे ही अन्य जो है नित्य-कर्म । फल-त्यागसे किये निष्काम । इसीलिये है मोक्षकी सीम । पायी उसने ॥ ९९ ॥ ऐसे शुभाशुभ संसार । तज कर जो धनुर्धर । वैराग्य मोक्ष-द्वार पर । आ के खडा हुवा ॥ ९०० ॥ ज्ञानेश्वरी ७९०

सकल भाग्यकी है जो सीमा । तथा है मोक्ष लाभकी प्रमा । विविध कर्ममागोंका श्रम । शांत होता यहां ॥ १ ॥ मोक्ष-फलका जो दिया हुवा ओल । अथवा सुकृत तरुका है फूल । वैराग्य कमल पर अलिकुल । बैठता जैसे ॥ २ ॥ जैसे आत्म-ज्ञान सुदिनका । वार्ता देनेवाले अरुणका । उदय होता है वैराग्यका । उस समय ॥ ३ ॥ अथवा मानो वह आत्म-ज्ञान । हाथमें जिससे आता निधान । उस वैराग्यका है दिव्यांजन । आता है बुद्धिमें ॥ ४ ॥ ऐसी जो मोक्षकी योग्यता । सिद्ध होती है पांडुसुता । विहित कर्म जो करता । उसको सदैव ॥ ५ ॥ यह विहित कर्म जो अर्जुन । अपना मानो अनन्य जीवन । गुरु सर्वात्मकका है पूजन । श्रेष्ठ तम जो ॥ ६ ॥ या संपूर्ण भोग सह् जैसे । पतिव्रता रमती पतिसे । उसी क्रियाको कहते वैसे । किया सभी तप ॥ ७ ॥ या बालकको माताके बिन । दूसरा क्या है अन्य साधन । तभी है माताकी गोद मान । उसका धर्म ॥ ८ ॥ केवल पानी ही मान मीन । गंगाको नहीं तजके जान । पाता जैसे सभी तीर्थ स्थान । सागर सहज ॥ ९ ॥ वैसे है अपने जो विहित । उपाय स्मरनेसे सतत । ऐसे करता कि जगन्नाथ । मानले भार ॥ ९१० ॥ अजी ! जिसको जो विहित । ईश्वरका है मनोगत । मान करनेसे निभ्रांत । मिलता वह ॥ ११ ॥ अजी ! मनमें जो उतरती । दासी भी है स्वामिनी बनती । शीस देकर होती जो प्राप्ति । स्वामीकी कृपा ॥ १२ ॥ वैसे स्वामीका है मनोभाव । न चूकता है परम सेवा । यह छोड दूसरा पांडव । केवल वाणिज्य ॥ १३ ॥ ७९१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विंदति मानवः ॥ ४६ मोक्षके लिये स्वधर्ममें आस्था अनिवार्य है— तभी है विहित क्रिया करना । मानो ईश्वरकी आज्ञा पालना । जिससे प्राप्त हुवा है अर्जुन । आकार भूतोंको ॥ १४ ॥ टुकडोंसे जो अविद्याके । बनाकर गुड्डे उनके । खिलाता है तीन गुणोंके । अहंकार सूत्रसे ॥ १५ ॥ जिससे यह विश्व समस्त । अंतर्बाह्य संपूर्ण भरित । रहते हैं जैसे दीप जात । तेजसे वैसे ॥ १६ ॥ वह सर्वात्मक ईश्वर । स्वकर्म कुसुमसे वीर । पूजा जाता जब अपार । तोषता वह ॥ १७ ॥ तब है जैसी पूजासे । संतुष्ट आत्म-रामसे । मिलता अति प्रेमसे । वैराग्य-प्रसाद ॥ १८ ॥ उस वैराग्य-प्रसादके कारण । होता है सतत ईश-चिंतन । नहीं सुहाता अन्य कुछ मान । वमन है सारा ॥ १९ ॥ जैसे प्राणनाथके वियोगमें । वियोगिनी दुःख पाती जीनेमें । चुभते सारे सुख भोगनेमें । दुःख रूप ॥ १२० ॥ उदय न होते सम्यग्ज्ञान । ध्यानसे तन्मयता अर्जुन । आती है ऐसी योग्यता जान । बोधसे ही ॥ २१ ॥ इसीलिये जो मोक्ष-लाभार्थ । तनसे आचरता है व्रत । उसे स्वधर्ममें आस्था पार्थ । रखनी ही होगी ॥ २२ ॥ स्वधर्मसे नियत-कर्म स्वभावके दोषोंको दूर कहता है— अजी है अपना जो स्वधर्म । आचरणमें यदि विषम । तो भी देखना है परिणाम । फळता जो ॥ २३ ॥ विस्तार जिसका विश्व प्रेरता प्राणिमात्र जो । उसको पूजके मोक्ष पाता स्वकर्म पुष्पसे ॥ ४६ ॥ ज्ञानेश्वरी ७९२

श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् । स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ ४७ ॥ अपने हितके लिये सब । नीम है सुख दायक जब । उसके तीतापनसे तब । उक्तायें कैसे ॥ २४ ॥ फलनेसे प्रथम जैसे । आशा भंग होता केलेसे । इसीलिये उखाडनेसे । फल मिलेगा क्या ॥ २५ ॥ स्वधर्मका आचरण । करना जान कठिन । तजा तो मोक्ष अर्जुन । मिलेगा कहां ? ॥ २६ ॥ तथा अपनी जो माता । कुलटा होनेसे पार्था । तो भी होते हैं जीविता । स्नेह न होता टेढा ॥ २७ ॥ अथवा जो है परकीय । रंभासे सुंदर काय । उससे मिले क्या स्तन्य । बालकको कभी ॥ २८ ॥ अजी ! पानीसे भी बहुत । गुणमें उत्तम घृत । इससे कह मीन पार्थ । रहेगा क्या उसमें ॥ २९ ॥ विश्वको होता है जो विष । जंतुओंका वह पीयूष । तथा विश्वका गुड देख । विष है उनको ॥ ९३० ॥ इसीलिये है जो शास्त्र-विहित । कर्मसे खुलता भव अंकित । तभी कष्टदायक भी विहित । करना कर्म ॥ ३१ ॥ अपना विहित-कर्म तजकर । दूसरोंका भला जो अपनाकर । जैसे पैरोंसे चलना छोडकर । चलना सिरसे ॥ ३२ ॥ इसीलिये जो कर्म अपना । स्वभावसे मिला हुवा मान । करनेसे ही कर्म-बंधन । छूटता पार्थ ॥ ३३ ॥ तथा स्वधर्मको पालना । पर-धर्म जान तजना । यह नियम न पालना । उस समय ॥ ३४ ॥

हलका अपना धर्म भला है पर धर्मसे । जलता दोष जो कर्म नियुक्त जो स्वभावसे ॥ ४७ ॥ ७९३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

जब न होता आत्मानुभव । कर्म नहीं छूटता पांडव । उन्हे भोगना दुःख सदैव । मिलता मात्र ॥ ३५ ॥ सहजं कर्म कौंतेय सदोषमपि न त्यजेत् । सर्वारंभा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥ ४८ ॥ प्रत्येक कर्म करते समय प्रारंभमें आयास होते हैं— इसीलिये किसी भी कर्ममें । आयास होते हैं प्रारंभमें । तब कह तू क्या स्वधर्ममें । रहा दोष ॥ ३६ ॥ अजी ! सरल मार्ग चलना । पैरोंका यदि है थक जाना । तो घने जंगलमें घुसना । तब भी वही ॥ ३७ ॥ शिला या साथ लिया पाथेय । एक ही भार है धनंजय । विश्रांतिमें जो सुखका होय । लेना है वही ॥ ३८ ॥ वैसे तो दाना और भूसा । कूटनेमें श्रम एक-सा । पकानेमें श्वानका मांस । तथा हविष्यान्न ॥ ३९ ॥ दधि तथा जलका मंथन । व्यापार जैसा एक समान । बालू तथा तिलोंका पेरना । एक ही जैसा ॥ ९४० ॥ करनेमें नित्यका होम हवन । जलाके आग करना दहन । फूंकके धूम सहना है अर्जुन । एक जैसा ही ॥ ४१ ॥ धर्म-पत्नी या वारांगना । पोसनेमें कष्ट समान । वारांगना रुख करना । अन्याथ क्या दूसरा ॥ ४२ ॥ पीठमें लगके हथियार । आती जब मृत्यु धनुर्धर । तब सम्मुख हो लडकर । करना विक्रम ॥ ४३ ॥ अकुल की मारके भयसे । परगृहमें खाती है वैसे । अपने पतिको तजनेसे । मिला ही क्या अपना ॥ ४४ ॥ सहज प्राप्त जो कर्म न छोडना सदोष भी । दोष हैं सब कर्मोंमें जैसे हैं धूम आगमें ॥ ४८ ॥ ज्ञानेश्वरी ७९५

वैसे कमी कोई कर्म । नहीं होता बिना श्रम । तब है विहित कर्म । करना क्या बुरा ॥ ४५ ॥ लेनेसे जब अल्प अमृत । मिलता है अमर जीवित । तब सर्वस्व देनेमें पार्थ । जाता क्या अपना ॥ ४६ ॥ अजी ! क्यों मूल्य देकर । पीना विष खरीद कर । मरना आत्म-दाह कर । पड़ता है जो ॥ ४७ ॥ वैसे कष्ट देकर इंद्रियोंको । खर्च कर आयुष्यके दिनोंको । और क्या इकट्ठा किया पापको । दुःखके लिये ॥ ४८ ॥ इसलिये पालना स्वधर्म । पालनेसे दूर होते श्रम । तथा उचित देता परम- । पुरुषार्थ राज ॥ ४९ ॥ यह कारण है अर्जुन । स्वधर्मका ही आचरण । संकट समयमें स्मरण । सिद्ध मंत्रका जैसे ॥ ९५० ॥ या नांव जैसे समुद्रमें । दिव्यौषधि महारोगमें । तथा स्वधर्म जगतमें । नहीं भूलना ॥ ५१ ॥ फिर करना कपिध्वजा । स्वकर्मसे ही महापूजा । तुष्ट हो ईश तम रज । करेगा दूर ॥ ५२ ॥ शुद्ध सत्वकी है बाट । तथा अपनी उत्कंठा । भव स्वर्ग कालकूट । दिखांती ऐसे ॥ ५३ ॥ जिस वैराग्यके कहे लक्षण । यही पहले संसिद्धि लक्षण । वहां पहुंचना है विलक्षण । जिस स्थान पर ॥ ५४ ॥ इस भूमिकाको प्राप्त कर । साधक वैसे होता है फिर । सर्वत्र क्या पाना धनुर्धर । कहता हूं अब ॥ ५५ ॥ निर्मल स्नेह पक्व-फलकी भांति अलिप्त होता है— देहादिक है संसारमें । तन ही पड़ा है फंदेमें । फंस भी न आता जालमें । वायु जैसे ॥ ५६ ॥ ७९५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग'

असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः । नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥ ४९ ॥ जैसे आता है पकताका काल । न डांड फल या फल डंटल । न धरता वैसे स्नेह निर्मल । होता है सर्वत्र ॥ ५७ ॥ पुत्र संपदा कलत्र । इससे होता स्वतंत्र । मेरा न कहता पात्र । विषका जैसे ॥ ५८ ॥ रहने दे यह विषय-मात्रसे । बुद्धि मुडती है पीछे चली जैसे । पीछे लौटकर एकांतमें ऐसे । रहती है हृदयमें ॥ ५९ ॥ ऐसे है उसका अंतःकरण । बाहर आनेसे डरता जान । राजाकी सौगंधसे लेके प्रण । न आती दासी जैसे ॥ १६० ॥ इस प्रकार जो चित्त । एकाग्र करके पार्थ । आत्म-चिंतनमें नित । लगाता है ॥ ६१ ॥ दृष्टादृष्ट कामना तब । जैसे नष्ट हो जाती हैं सब । आग राखमें दबती तब । धुंवा नहीं आता ॥ ६२ ॥ मन होता ऐसा अंतर्मुख । इच्छाएं नष्ट होती हैं देख । तब प्राप्त करता साधक । भूमिका ऐसी ॥ ६३ ॥ अनासक्त कर्मयोगीकी संन्यस्त अवस्था— विपरीत ज्ञान संपूर्ण । नष्ट हो करके अर्जुन । ज्ञानमें ही अंतःकरण । होता है स्थिर ॥ ६४ ॥ संचित जैसे व्ययसे चुकता । वैसे प्राचीन भोगसे मिटता । नया क्रियमाण नहीं होता । किसी कर्मसे ॥ ६५ ॥ ऐसी जो कर्म-समय दशा । वहां बनती है वीरेशा । फिर श्रीगुरु आप ऐसा । मिल जाता है ॥ ६६ ॥ न कहीं रख आसक्ति जीतके मन निःस्पृह । नैष्कर्मकी महासिद्धि पाता संन्यास साधके ॥ ४९ ॥ ज्ञानेश्वरी ७९६

रातके जो चार प्रहर । होते ही मिटाके अंधार । आंखोंको दीखता भास्कर । उसी भांति ॥ ६७ ॥ अथवा आकर फलकी घौंद । करता केलेका बढ़ना बंद । श्रीगुरु मिल साधकको छंद । जगाते हैं मोक्षका ॥ ६८ ॥ चंद्र जो पूर्णिमासे आलिंगित । तजता जैसे सभी व्यंग पार्थ । वैसे उसको मिलती सतत । श्रीगुरुकी कृपा ॥ ६९ ॥ अज्ञान मात्र तब जो रहता । उस कृपासे है सभी मिटता । रजनी सहित है जैसे जाता । अंधार सारा ॥ ९७० ॥ अज्ञानके गर्भमें जैसे । कर्म कर्ता औ' कार्य ऐसे । यह त्रिपुटी रहनेसे । गर्भिणी ही मरी ॥ ७१ ॥ ऐसे अज्ञान नाशके साथ । नष्ट होते हैं सभी क्रिया जात । ऐसे समूल संभव पार्थ । होता संन्यास ॥ ७२ ॥ मूल अज्ञान संन्याससे ऐसे । दृश्यका स्थान ही मिट जानेसे । वहां जानना रहता है ऐसे । आत्मतत्व ॥ ७३ ॥ जगने पर जैसे अर्जुन । डूबे थे ऐसे स्थान । करना पड़ता क्या गमन । बचानेको ॥ ७४ ॥ जो न मैं जानता वह जानूंगा । ऐसा दुष्ट स्वप्न जब मिटेगा । ज्ञाता ज्ञान विरहित जो होगा । चिदाकाश केवल ॥ ७५ ॥ सुखाभास सह वह दर्पण । दूर करनेसे अर्जुन । रहता देखनेके बिन । देखनेवाला जो ॥ ७६ ॥ वैसे न जानना जो गया । साथ जानना भी ले गया । फिर निष्क्रिय रह गया । चिन्मात्रा ही ॥ ७७ ॥ स्वभावसे वहां धनंजय । न रही किसी भांतिकी क्रिया । इसीलिये वह कहा गया । नैष्कर्म्य ऐसा ॥ ७८ ॥ होता है जब वायुका लोप । उससे होता तरंग लोप । तब जैसे रहता है आप । समुद्र मात्र ॥ ७९ ॥ ७९७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

ऐसे होना जब नहीं घड़ता । वह नैष्कर्म्य सिद्धि है कहाता । सभी सिद्धियोंमें यह जो होता । परम श्रेष्ठ ॥ ९८० ॥ मंदिरके कार्यमें कलश । गंगाकी सीमा सिंधु-प्रवेश । वैसे सुवर्ण-सिद्धिमें कस । सोलहवा अंतिम ॥ ८१ ॥ ऐसे अपना अज्ञान । मिटा देता जो वह ज्ञान । वह भी निगल अर्जुन । रहनेकी दशा ॥ ८२ ॥ इसके पर कुछ नहीं । पाना ऐसे रहता नहीं । इसीलिये कहना यही । परम-सिद्धि ॥ ८३ ॥ किंतु यही जो आत्म-सिद्धि । जैसे है कोई भाग्य-निधि । श्रीगुरुकृपा-उपलब्धि । होती तब मिलती ॥ ८४ ॥ सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे । समासेनैव कौंतेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥ ५० ॥ ब्रह्मत्व-सिद्धिका विवेचन— उदय होते ही दिनकर । प्रकाश ही होता है अंधार । अथवा दीप सह् कर्पूर । होता है दीप ॥ ८५ ॥ अथवा लवण-कणिका । मिलकर जैसे उदका । होती है आप भी उदक । उसी प्रकार ॥ ८६ ॥ या निद्रित होता है जागृत । स्वप्न सह् नींद होती व्यर्थ । तथा अपना रूप जागृत । पाना जैसे ॥ ८७ ॥ जिस किसीके सुदैवसे । श्रीगुरु-वाक्य श्रवणसे । द्वैत निगल स्थिरतासे । रहता स्ववृत्तिमें ॥ ८८ ॥ श्रवण वचनका मिलन । होते ही जैसे सुन अर्जुन । स्वयं-स्वरूप हो जाना मान । अपने आपमें ॥ ८९ ॥ मिला है सिद्धिमें ब्रह्म कैसे किस प्रकारसे । ज्ञानकी श्रेष्ठ जो निष्ठा अल्पमें कहता सुन ॥ ५० ॥ ज्ञानेश्वरी ७९८

उसको फिर कुछ करना । रहता क्या कह अर्जुन । आकाशको आना तथा जाना । रहता है क्या ॥ ९९० ॥ इसीलिये उसको कहीं । त्रिशुद्धि करना है नहीं । न हुवा ऐसे कुछ कहीं । उसके लिये ॥ ९१ ॥ उन्हे स्व-कर्मकी अग्निमें । काम्य निषेध ईंधनमें । रज तमको जलानेमें । करना प्रारंभ ॥ ९२ ॥ पुत्र वित्त तथा परलोक । इन तीनोंका जो अभिलाष । हुवा जैसे अपना सेवक । ऐसे होगा ॥ ९३ ॥ स्वैर इंद्रियोंमें सर्व-स्पर्शसे । आई हुई जिस मलिनतासे । मुक्त करनेमें प्रत्याहारसे । किया जाता स्नान ॥ ९४ ॥ तथा स्वधर्मका जो फल । ईश्वरार्पण करके बल । लेकर किया है गरल । वैषम्यका वह ॥ ९५ ॥ आत्म-साक्षात्कारमें ऐसे । ज्ञानका उत्कर्ष हो कैसे । इसकी सामग्री जो ऐसे । पाता है वह ॥ ९६ ॥ तथा है ऐसे ही समय । सद्गुरु मिले धनंजय । उसने ज्ञान-दान कार्य । सही किया तो भी ॥ ९७ ॥ वैराग्यका लाभ और श्रीगुरुके लोभसे अनुभव-अंकुर फूटता है- औषध लेते ही तत्क्षण । रोगमें आयेगा क्या गुण । या सूर्योदयसे तत्क्षण । मध्यान्ह होगा क्या ॥ ९८ ॥ सुक्षेत्र तथा है जो तर । बोया बीज गला सुंदर । किंतु फल आनेमें देर । लगेगा ही ॥ ९९ ॥ चले मार्ग पर जो सरल । वहां मिला सत्संगका मेल । पहुंचने तक कुछ काल । लगेगा ही ॥ १००० ॥ ऐसे हुवा वैराग्यका लाभ । तथा मिला श्रीगुरुका लोभ । अंतःकरणमें फूटा कोंब । विवेकका ॥ १ ॥ ७९९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

वह ब्रह्म ही एक सत । दूसरा संपूर्ण है भ्रांत । इसको जिसने प्रतीत । किया है दृढ ॥ २ ॥ किंतु वह जो परब्रह्म । सर्वात्मक है सर्वोत्तम । जिससे मोक्षका भी काम । रहता नहीं ॥ ३ ॥ अपनेमें ही यह जो ज्ञान । पचाता तीनो अवस्था जान । उस ज्ञानका भी आलिंगन । करती जो वस्तु ॥ ४ ॥ ऐक्यकी एकता होती समाप्त । आनंद कण भी होता है लुप्त । कुछ न करके रहता नित । जो है कुछ ॥ ५ ॥ उस ब्रह्ममें ही लय होकर । रहना है ब्रह्म ही बनकर । क्रमसे उसको भी प्राप्त कर । लिया है तब ॥ ६ ॥ जैसे है कोई बुभुक्षित । करता षड्रसान्न प्राप्त । तब प्रति ग्राससे तृप्त । होता है वैसे ॥ ७ ॥ मिला वैराग्य-स्नेहका भरण । विवेक दीप कर प्रज्वलन । उसमेंसे आत्म-तत्व निधान । पा लेना है ॥ ८ ॥ भोगना है आत्म-ऋद्धि । इतनी योग्यता सिद्धि । जिसने है निरवधि । पायी भूषण रूप ॥ ९ ॥ जिस क्रमसे वह ब्रह्म । होता जाता यह सुगम । उस क्रमका अब मर्म । कहता हूं सुन ॥ १०१० ॥ बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च । शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥ ५१ ॥ द्वंद्व चिंता छोड़ कर स्व-चिंतन करना शुद्ध-बुद्धि है— श्रीगुरुके दिखाये मार्ग पर । चारु विवेक-तीर्थ तटपर । साधक बुद्धिका मल धोकर । तदुपरांत ॥ ११ ॥ जुड़ाके सात्विकी बुद्धि धृतिकी डोर खींचके । तजके शब्द स्पर्शादि जीतके राग-द्वेषको ॥ ५१ ॥ ज्ञानेश्वरी ८००

फिर जो राहुके मुखसे मुक्त । चंद्र-प्रभा चंद्रसे आलिंगित । वैसे शुद्ध बुद्धि करती प्राप्त । अपने ही रूपको ॥ १२ ॥ जैसे दोनों कुलको तजकर । प्रिया प्रियमें रत निरंतर । वैसे द्वंद्व चिंतन तजकर । करती स्वचिंतन ॥ १३ ॥ वैसेही ज्ञान जैसे जीवन । विषयोंमें ले जा अनुदिन । इंद्रियोंसे किये बडे जान । शब्दादिक जो ॥ १४ ॥ दूर होते ही रश्मि जाल । मिट जाता है मृगजल । वैसे ही धृतिसे निर्मल । किये पांचोंही ॥ १५ ॥ खाया हुवा जो अधमान्न । करते हैं जैसे वमन । इंद्रियोंसे ऐसे वासना । सह किया विजय ॥ १६ ॥ आत्माकार वह वृत्ति फिर । लगाके गंगाके तट पर । प्रायश्चित्त किया जो धोकर । शुद्धिकारक ॥ १७ ॥ तब उसने सात्विक दृष्टिसे । विशुद्ध किये हुए इंद्रियोंसे । मन सह योग-धारणासे । लगाई वह ॥ १८ ॥ वैसे ही प्राचीन इष्टानिष्ट । होती है भोगोंसे जब भेंट । आयी हुई कटुतासे रुष्ट । होते नहीं कभी ॥ १९ ॥ या मिले सुंदर विषय । प्रारब्धवश धनंजय । न करते उस समय । अभिलाषा भी ॥ १०२० ॥ ऐसे इष्टानिष्टमें पार्थ । रागद्वेषसे हो रहित । वन गिरि-गुहामें नित । करते वास ॥ २१ ॥ साधनावस्थाका विवेचन— भीड भाड तजकर । वनस्थलमें जाकर । अंगों सह धनुर्धर । रहता आप ॥ २२ ॥ शम-दमादिकोंसे खेलना । सदा मौनसे ही है बोलना । गुरु-वचनोंमें बिताना । समय सारा ॥ २३ ॥ (90) ८०१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-जोशी

विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः । ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ ५२ ॥ शरीरमें बल रहना । अथवा भूखको मिटाना । या जीभके पूर्ण करना । मनोरथ सारे ॥ २४ ॥ करनेमें वह भोजन । नहीं जानता है ये तीन । संतुष्ट होता है अल्पान्न । खाकर ही वह ॥ २५ ॥ आसनकी उष्णतासे । प्राणकी क्षति होनेसे । रहे प्राण जितनेसे । उतनाही खाना ॥ २६ ॥ जैसे पर-पुरुषकी इच्छा मान । न देती कुल-वधु अपना तन । वैसे ही निद्रालस्य दायक अन्न । खाता ही नहीं ॥ २७ ॥ दंडवत जब वह करता । तभी तन भूमिस्पर्श करता । वैसे ही भूमिपे वह नहीं पड़ता । अविचारसे कभी ॥ २८ ॥ शरीर निर्वाह हो अपना । उतने हाथ पैर हिलाना । ऐसे है अंतर्बाह्य अपना । संयम करता ॥ २९ ॥ तथा देख मनका चौखट । वृत्ति नही जाती निकट । वहां वाचाकी जो खटपट । रहती ही कहां ॥ १०३० ॥ ऐसे तन वचन मानस । जीतके सब बाह्य प्रदेश । आधीन करना है आकाश । ध्यानका उसको ॥ ३१ ॥ गुरु-वाक्यसे होता जो जागृत । उस बोधमें देखता निश्चित । दर्पणमें जैसे देखता पार्थ । अपना स्वरूप ॥ ३२ ॥ अपनेको ही है ध्यानस्थ । ध्यान-रूप वृत्तिमें पार्थ । ध्येयत्वसे लेता है नित । ध्यान प्रकार वह ॥ ३३ ॥ ध्यान ध्येय और ध्याता । होते हैं एकरूपता । तब तक पांडुसुता । करना ध्यान ॥ ३४ ॥ वाक् काय मनको जीत एकांत अल्प सेवन । दृढ वैराग्यसे युक्त डूबा जो ध्यान-योगमें ॥ ५२ ॥ ज्ञानेश्वरी ८०२

इसीलिये जो है मुमुक्षु । आत्म-ज्ञानमें होता दक्ष । सदैव वह योग-पक्ष । लेकर रहता ॥ ३५ ॥ अपान रंध्रद्वय । बीचमें धनंजय । उसके जो है मध्य । एडीसे दबाके ॥ ३६ ॥ आकुंचन करना अध । करके तीन ही बंध । होते हैं जो वायुभेद । करना एक ॥ ३७ ॥ कुंडलिनीको जगाकर । अध्यात्मका विकासकर । आधारादिसे भेद कर । सहस्रार तक ॥ ३८ ॥ सहस्रदलका जो मेघ । पीयूष बर्षता सवेग । उसके मूल पर ओघ । ला करके ॥ ३९ ॥ नाचता रहता पुण्य गिरिपर । उस चैतन्य भैरवका खापर । मन-प्राण खिचडीसे भरकर । तदुपरांत ॥ १०४० ॥ योगाभ्यास दृढ होने पर । यह तीनों बंध आगे कर । किया है ध्यान पिछली ओर । ब्रह्म सिद्ध ॥ ४१ ॥ तथा योग और ध्यान । दोनों हो पूर्ण निर्वहन । आत्म-ज्ञानमें हो लीन । सो पहले ही ॥ ४२ ॥ वीतराग सरीखा । जोड़ रखा है सखा । वह सभी भूमिका । करता पार ॥ ४३ ॥ देखना जो है दीखने तक । साथ देना आंखोंको दीपक । तब न दीखेगी कहां तक । वह जो वस्तु ॥ ४४ ॥ ऐसे करता जो मोक्ष प्रवर्तन । ब्रह्ममें चित्त हो जाने तक लीन । साथ रहता है वैराग्य अर्जुन । उसका नाश कैसे ॥ ४५ ॥ इसीलिये है वैराग्य । ज्ञानाभ्यासका सौभाग्य । करके देता जो योग्य । आत्म-लाभ ॥ ४६ ॥ वैराग्यका कवच पहन कर । उससे जैसे वज्रांग बनकर । वह राजयोगके तुरंग पर । होता आरूढ ॥ ४७ ॥ ८०३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग