ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् । दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥ ४३ ॥ ऐसे जो स्वाभाविक सशक्त । सहाय बिन उद्भट पार्थ । ऐसे श्रेष्ठ शौर्य विकसित । गुण है प्रथम ॥ ५७ ॥ तथा जैसे सूर्यका प्रताप । कोटि नक्षत्र करता लोप । किंतु उनसे न होता लोप । चंद्र सह भी वे हो तो ॥ ५८ ॥ ऐसे प्रौढ गुणमें पार्थ । विश्वको करता विस्मित । किंतु आप न विचलित । होता है कभी ॥ ५९ ॥ ऐसा प्रगल्भ रूप जो तेज । क्षात्र-धर्मका गुण है दूजा । इसी भांति धैर्य है सहज । गुण तीसरा ॥ ८६० ॥ टूट पडा भी यदि आकाश । बुद्धिकी आंखें कभी मानुस । मिटता नहीं है स-साहस । वही है धैर्य ॥ ६१ ॥ तथा पानी कितना ही गहरा होता । कमल ऊपर आकर ही खिलता । या आकाश किसीसे नहीं हारता । ऊंचाईमें कभी ॥ ६२ ॥ कैसी ही विवश अवस्था । जीवनमें पाकर पार्था । न छेदती प्रज्ञा सर्वथा । स्थिर बुद्धिकी ॥ ६३ ॥ ऐसी दक्षता है जो चोख । यह है चौथा गुण देख । तथा जूझ जो अलौकिक । गुण पांचवा ॥ ६४ ॥ जैसे सूर्यमुखीका पुष्पक । सदा सूर्यकी ओर उन्मुख । वैसे वह शत्रुके सन्मुख । होता है सदा ॥ ६५ ॥ यत्न-पूर्वक गर्भिणी जैसे । टालती है पुरुषको वैसे । समरमें पीठ दिखानेसे । बचता रहता ॥ ६६ ॥ क्षत्रियोंका यह आचार । पांचवा गुणेंद्र धनुर्धर । पुरुषार्थीके सिरपर । भक्ति है जैसे ॥ ६७ ॥ शौर्य धैर्य प्रजा रक्षा युद्धमें अपलायन । दातृत्व दक्षता तेज क्षात्र-धर्म स्वभावसे ॥ ४३ ॥ ७८७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग