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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् । मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥ २५ ॥ तामस कर्मका लक्षण— वह जो तामस कर्म । निंदाका है काला धाम । निषिद्ध कर्मका जन्म । हुवा हो सफल ॥ ११ ॥ वह जब संपन्न होता । दृष्टिमें कुछ भी न आता । जैसे पानीपे लिया जाता । रेखा चित्र ॥ १२ ॥ किया हो जैसे छासका मंथन । अग्निके लिये राख फूकी मान । या कोल्हूमें रेती पेरी अर्जुन । उसी प्रकार ॥ १३ ॥ पवनपे भूसा धरना । तीरसे गगन छेदना । पवनको फांस डालना । बांधानेके लिये ॥ १४ ॥ जैसे यह सकल । नासता है निष्फल । वैसे होता सकल । तामस कर्म ॥ १५ ॥ वैसे नरदेहके समान । व्यय होता है व्यर्थ ही धन । नासता कार्यके साथ जान । विश्वका सुख ॥ १६ ॥ कमल वनपे कांटेका फांस । खींचनेसे होता जिसके नाश । तथा करना वनका विध्वंस । पांडु कुमार ॥ १७ ॥ जैसे अपना तन जलाता । लोगोंको अंधेरेमें डालता । द्वेषसे दीपपे झेंप लेता । जैसे पतंग ॥ १८ ॥ वैसे सर्वस्व हो व्यर्थ । देह पर हो आघात । तथा होते अन्य त्रस्त । जिस कार्यसे ॥ १९ ॥ माखी अपनेको निगलाती । दूसरोंको वमन कराती । स्मरण दिलाती ऐसी कृति । तामस कर्म ॥ ६२० ॥ विनाश व्यय निष्पत्ति सामर्थ्य भी न देखके । मोहसे जो किया जाता कर्म तामस जान तू ॥ २५ ॥ ज्ञानेश्वरी ७६४

अपना सामर्थ्य न देखता । आगेका विचार न करता । मनमें जो आता सो करता । न देखता कुछ ॥ २१ ॥ मेरा सामर्थ्य कितना । कर्मकी कैसी है घटना । करने पर है क्या होना । सोचता नहीं ॥ २२ ॥ इस भांतिसे सब जो विचार । अविवेक पगसे पोंछकर । उद्यत होता है स-अहंकार । कर्ममें वह ॥ २३ ॥ अपना ही आसरा जलाकर । भड़कता है अग्नि भयंकर । या मर्यादा भंग कर सागर । उमड पड़ता ॥ २४ ॥ तब कम अधिक न जानता । आगे पीछे कुछ भी न देखता । पथ कुपथ भी एक करता । तामस कर्म ॥ २५ ॥ कृत्याकृत्य ऐसा कुछ लेकर । आप पर विचार भी न कर । होता है जो कर्म धनुर्धर । निश्चय ही तामस ॥ २६ ॥ ऐसे गुणत्रय भिन्न । कर्मकी स्थिति अर्जुन । यह किया विवेचन । कारणों सह ॥ २७ ॥ अब इन कर्मोंको जो करता । कर्मोंके अभिमानसे जो कर्ता । वह जीव भी कैसे त्रिविधता । पाता है देख ॥ २८ ॥ जैसे होके चतुर्थाश्रमवश । चतुर्धा दीखता एक पुरुष । कर्ता दीखता कर्मभेद वश । तीन प्रकारका ॥ २९ ॥ तीनमें अब मैं पार्थ । सात्विक तुझे प्रस्तुत । करता हो दत्त चित्त । सुन तू इसे ॥ ६३० ॥ मुक्तसंगोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः । सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्विक उच्यते ॥ २६ ॥ निःसंग निरहंकारी उत्साही धैर्यसे भरा । फले जले अविकारी कर्ता सात्विक है कहा ॥ २६ ॥ ७६५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद ग्रोग

सात्विक कर्ताके लक्षण— छोडकर फलोद्देश । जैसे बढ़ जाती शाख । चंदनका जो विशेष । कहाता बावनी ॥ ३१ ॥ या फल बिना ही जो सार्थक । होती है जैसे नाग लतिका । वैसे करता है नित्यादिक । कर्म सदैव ॥ ३२ ॥ उनमें नहीं फल-शून्यता । अथवा नहीं है विफलता । फलके भी फल पांडुसुता । होते हैं क्या ॥ ३३ ॥ आदर-पूर्वक सब करता । किंतु किया ऐसा न कहता । वर्षाकालमें नहीं गर्जता । बादल जैसे ॥ ३४ ॥ वैसे परमात्म-प्रीत्यर्थ । समर्पणमें जो उचित । कर्म-समुदाय है पार्थ । करनेमें उत्पन्न ॥ ३५ ॥ कालका उल्लंघन नहीं करता । शुद्ध स्थलका विचार भी रखता । तथा शास्त्र-दृष्टिसे भी देखता । कार्य निर्णय ॥ ३६ ॥ वृत्तिको सदा एकाग्र रखता । चित्तको फलसे दूर रखता । नियमोंका बंधन भी पालता । शास्त्रोक्त जो ॥ ३७ ॥ इस निरोधको सहनेमें । सर्वोत्कृष्ट धैर्यको मनमें । रखनेका सद् चिंतनमें । रहता है नित ॥ ३८ ॥ तथा आत्म-प्रेमसे विहित । कर्म करनेमें जो सतत । देह-सुखकी चिंता किंचित । करता नहीं ॥ ३९ ॥ निद्रासे सदा दूर रहता । भूखको भी नहीं जानता । देह-सुख नहीं मिलता । उसको कभी ॥ ६४० ॥ सोना जैसे आगमें तपता । भार घट कसमें चढ़ता । वैसे उत्साह बढ़ता जाता । कर्ममें उसका ॥ ४१ ॥ पति पर प्रेम हो तो सच । सतीको जीनेमें हो संकोच । चितामें जलनेमें रोमांच । होते पतीसह ॥ ४२ ॥ ज्ञानेश्वरी ७६६

प्रिय हो आत्माके समान । उसके लिये क्या अर्जुन । देहको दुःख होता मान । होगा क्या क्लेश ॥ ४३ ॥ विषय-सुख जैसे टूटता जाता । देह तथा बुद्धिका लय हो जाता । कर्ममें ही आनंद बढ़ता जाता । उसको सदैव ॥ ४४ ॥ ऐसा जब कर्म करता । कोई समय ऐसा आता । कर्म करना भी रुकता । उस समय ॥ ४५ ॥ कगार परसे जब गिरता रथ । टूटेगा मान सकुचाता नहीं पार्थ । वैसे मनमें नहीं होता संकुचित । किंचित भी वह ॥ ४६ ॥ अथवा मैंने जो कर्म किया । संपूर्ण रूपसे सिद्ध भया । ऐसे मैंने बडा जय पाया । यह भी नहीं मानता ॥ ४७ ॥ ऐसे जो कर्म करता । जहां कहीं देखा जाता । उसे कहना तत्वता । कर्ता सात्विक ॥ ४८ ॥ राजसका अब अर्जुन । कहता सुन पहचान । आकांक्षाका आश्रय-स्थान । बनता विश्वका ॥ ४९ ॥ रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः । हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥ २७ ॥ राजस कर्ताके लक्षण— गांवका सब कल्मश जैसे । घूरेपे एक होता है वैसे । या स्मशानपे आता गांवसे । सारा अमंगल ॥ ६५० ॥ उसी भांति है जो अशेष । विश्वका सभी अभिलाष । पद प्रक्षालन विशेष । हुवा है स्थान ॥ ५१ ॥ इसीलिये फल लाभ । होता है जहां सुलभ । हो जाता है वहां लोभ । ऐसे कार्यमें ॥ ५२ ॥ फल कामुक आसक्त लोभी अस्वच्छ हिंसक । हर्ष औ' शोकसे मारा कर्ता राजस है कहा ॥ २७ ॥ ७६७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

तथा आप कमाया हुवा धन । व्यय न करता कवडी जान । उस पर करता क्षण क्षण । निछावर जीव ॥ ५३ ॥ सावध रहता जैसा कृपण । बक रखता मीनपे नयन । वैसे देख वह पराया धन । रहता दक्ष ॥ ५४ ॥ पास जानेसे जो उलझाता । लगनेसे देह ही फाडता । फल मानो जीभको जलाता । खट्टा बेर ॥ ५५ ॥ वैसे वह जो काया वाचा मन । दुखाता रहता सबका मन । करनेमें वह स्वार्थ-साधन । न देखता परहित ॥ ५६ ॥ वैसे ही करनेमें जो कर्म । होता है यदि वह अक्षम । किंतु नहीं होता मनोधर्म । अरोचक उसका ॥ ५७ ॥ कनक फल सबाह्य जैसे । भरा रहता विष कांटोंसे । रहता वह दुर्बल वैसे । सदा शुचित्वमें ॥ ५८ ॥ जब वह कर्म फल पाता । फूलकर कुप्पा बन जाता । विश्वको अंगूठा भी दिखाता । चिढाकरके ॥ ५९ ॥ या कर्म होता जब निष्फल । शोकमें डूब जाता पाताल । तथा धिक्कारता है सकल । कर्म जात ॥ ६६० ॥ देख ऐसा कर्माचरण । जान तू काया वाचा मन । कर्ता है राजस अर्जुन । निःसंशय वह ॥ ६१ ॥ अब कहता धनुर्धर । जो है कुकर्मका आगर । होता है जो ऐसा गोचर । कर्ता तामस ॥ ६२ ॥ अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठोनैष्कृतिकोऽलसः । विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥ २८ ॥ स्वच्छंदी क्षुद्र गर्विष्ठ घातकी शठ आलसी । दीर्घ-सूत्री सदा खिन्न कर्ता तामस है कहा ॥ २८ ॥ ज्ञानेश्वरी ७६८

तामस कर्ताके लक्षण— लगने पर मैं जैसे । आगेका जलता कैसे । यह न जानता वैसे । अग्निस्र्फुलिंग ॥ ६३ ॥ होता मैं कैसे वधका कारण । यह न जानता शस्त्र अर्जुन । कालकूटको नहीं होता ज्ञान । अपने परिणामका ॥ ६४ ॥ ऐसे वह धातुक क्रिया । करता रहता धनंजय । उससे अपना पराया । होता घात ॥ ६५ ॥ उसको जब जो कुछ करना । क्या होता है यह नहीं देखना । जिसभांति बवंडरका आना । ऐसी क्रिया उसकी ॥ ६६ ॥ उसका और जिस कार्यका । संबंध नहीं होता किसीका । पागलसे है जैसे कर्मका । नहीं होता वैसे ॥ ६७ ॥ बैलोंके गलेमें जैसे किल्हर । इंद्रियोंमें विषय है धनुर्धर । लगते हैं तब उन्हें भोगकर । बिताता जीवन ॥ ६८ ॥ हंसने या रोनेका काल । नहीं जानता जैसे बाल । वैसे ही सदा उच्छृंखल । रहता है वह ॥ ६९ ॥ होनेसे सदा प्रकृतिके आधीन । कृत्याकृत्य स्वादसे होता उलझन । अपने कृत्योंसे फूलता अर्जुन । कूडेके घरसा ॥ ६७० ॥ तथा कभी किसीको देनेमें मान । ईश्वरको भी न करता नमन । स्तब्धतामें पर्वतको भी अर्जुन । हराता वह ॥ ७१ ॥ अति कुटिल उसका मन । छुपाये हुए सभी वर्तन । पण्यांगना सम जो नयन । छल-मदसे भरे ॥ ७२ ॥ अथवा मानो कपटका । बनाया ही तन उसका । जीना मानो द्यूत-कर्मका । घर ही रहता है ॥ ७३ ॥ यह जो उसका प्रादुर्भाव । साभिलाष भिल्लका है गांव । उस राह पे कभी पांडव । जाना भी नहीं ॥ ७४ ॥ ७६९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग (88)

दूसरोंका सुख देख कर । मानता कष्ट अपने पर । जैसे लवण दूधमें गिर । करता अपेय ॥ ७५ ॥ अथवा जैसे ठंडे पदार्थ । आगमें पड़ कर पार्थ : भड़कते मानो वही मूर्त । अग्नि ही है ॥ ७६ ॥ जैसे अच्छा भला आहार । पहुंच पेटके अंदर । बनता मल धनुर्धर । उसी भांति ॥ ७७ ॥ बना है कभी किसीका कुशल । देखके वह जानता है शूल । तथा उस बताके प्रतिकूल । आता बाहर ॥ ७८ ॥ गुण लेकर जो देता दोष । अमृतका करता है विष । दूध पिलाता उसको विष । देता जैसे सर्प ॥ ७९ ॥ सुख मिलेगा इस लोकमें । गति मिलेगी परलोकमें । कर्म आता ऐसे समयमें । ऐसे समय ॥ ६८० ॥ आती है उसको अपने आप । निद्रा रखी है जैसे सुखरूप । दुर्व्यवहारमें अपने आप । भागती है वह ॥ ८१ ॥ जैसे द्राक्षारस या आम्र-रस । खानेमें मुख चुराता वायस । तथा अंधा बनाता है दिवस । जैसे उलूकको ॥ ८२ ॥ वैसे कल्याण-काल जब देखता । तब उसको है आलस आता । प्रमादमें है स्फुरण चढ़ता । चाहता वैसे ॥ ८३ ॥ जैसे सदैव समुद्रका उदर । वडवाग्नि रखता है भरकर । वैसे है वह विषाद निरंतर । रखता अपनेमें ॥ ८४ ॥ लेंड़ककी आगमें धूमावधि । या अपानमें होती है दुर्गंधि । इसी भांति वह जीवनावधि । विषाद करता ॥ ८५ ॥ वैसे कल्पांतके भी पार । फल प्राप्ति हो धनुर्धर । ऐसे रखता है व्यापार- । अभिलाषा ॥ ८६ ॥ विश्वके उस पारकी चिंता । चितमें ही करता रहता । किंतु हाथमें नहीं लगता । तृण भी उसके ॥ ८७ ॥ ऐसे वह लोगोंमें पार्थ । पाप-पुंज ही होता मूर्त । देखना ऐसे अन्याहत । कर्त्ता तामस ॥ ८८ ॥ ज्ञानेश्वरी ७७०

ऐसा कर्म कर्त्ता ज्ञान । इनके हैं चिन्ह तीन । दिखाये तुझे सुजन- । चक्रवर्ती ॥ ८९ ॥ बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु । प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय ॥ २९ ॥ बुद्धिके तीन प्रकार— जब अविद्याके ग्राममें । बढ़कर मोह बस्तिमें । तथा संदेह भूषणमें । सजके जो आती ॥ ९० ॥ आत्म-निश्चयके जो दर्शन । करनेमें सुंदर दर्पण । ऐसी बुद्धिका भी तुझे तीन । कहता प्रकार ॥ ९१ ॥ इन सत्त्वादि गुणोंने तीन । न किये इस विश्वमें कौन । विषयके प्रकार अर्जुन । कह तू मुझे ॥ ९२ ॥ बिना अग्निके कोई काष्ठ । हुवा है क्या विश्वमें सृष्ट । वैसे दृश्य-कोटिमें स्पष्ट । नहीं है जो त्रिधा ॥ ९३ ॥ इसीलिये ये तीनों गुण । करते बुद्धिको त्रिगुण । वैसे धृतिको भी अर्जुन । त्रिधा किया है ॥ ९४ ॥ एक जो ऐसे दुष्ट तीन । लेकर भिन्न भिन्न लक्षण । इनको कहेंगे स-लक्षण । यहीं अब ॥ ९५ ॥ बुद्धि और धृतिके जहां । भाग दो किये गये यहां । प्रथम बुद्धिके ही यहां । कहूँगा प्रकार ॥ ९६ ॥ उत्तम मध्यम निकृष्ट । संसारमें आता जो सुभट । उस प्राणीकी तीन बाट । होती है यहां ॥ ९७ ॥ अकरण काम्य जो निषिद्ध । उसके मार्ग हैं ये प्रसिद्ध । ये हैं जो संसारमें सबाध । जीवोंको यहां ॥ ९८ ॥ बुद्धिके भेद ये तीन वैसे ही धृतिके कहे । गुणानुसार जो सारे कहता भिन्न भिन्न मैं ॥ २९ ॥ ७७१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये । बंधं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३० ॥ सात्त्विक बुद्धिके लक्षण- तभी अधिकारसे मान लिया । तथा विधि प्रवाहसे जो आया । वह एक ही भला कहलाया । नित्यकर्म ॥ ९९ ॥ वही आत्म-प्राप्ति फल । दृष्टि रखके केवल । प्यासमें जैसा है जल । सेवन योग्य ॥ ७०० ॥ इतनेसे ही वह जो कर्म । छुडाता जन्म-भय विषम । तथा कर देता है सुगम । मोक्ष-सिद्धि ॥ १ ॥ ऐसे कर्मको है करता । संसार भयसे छूटता । करणीयत्वमें बढता । मुमुक्ष पदमें ॥ २ ॥ वहां जो बुद्धि ऐसा । बंधाती है भरोसा । मोक्ष रखा हुवासा । मिलेगा ही ॥ ३ ॥ इसीलिये रची जैसे निवृत्ति । तलमें आधार डाल प्रवृत्ति । इस कर्ममें डुबकी लगाती । इतनेमें ही ॥ ४ ॥ तृषार्थ जैसे पानीसे जीता । पूरमें नांव है तरता । या अंधार कूपसे छूटता । सूर्य प्रकाशसे ॥ ५ ॥ नाना पथ्यसे औषध लेता । ऐसे रोग-ग्रस्त भी बचता । या मछलीको पानी मिलता । तब जैसे वह ॥ ६ ॥ निश्चय-पूर्वक बचता । उसमें न होता अन्यथा । वैसे कर्म-प्रवृत्त होता । मिलता मोक्ष ॥ ७ ॥ कर्म रहता जो करणीय । वहां पूर्ण ज्ञान धनंजय । तथा रहता अकरणीय । कहा है आगे ॥ ८ ॥ क्या कर्तव्य अकर्तव्य बंध मोक्ष भयाभय । धरना तजना जाने वह है बुद्धि सात्त्विक ॥ ३० ॥ ज्ञानेश्वरी ७७२

वह जो कर्म काम्यादिक । है संसार भय-दायक । अकरणीय है तू देख । कहा गया है ॥ ९ ॥ उस अकार्य कर्ममें । जन्म मरण कालमें । प्रवृत्ति सदा पीछेमें । भागती है ॥ ७१० ॥ जैसे आगमें नहीं घुसता । अथाह पानीमें न कूदता । प्रज्वलित शूल न धरता । उसी प्रकार ॥ ११ ॥ या काला नाग जो फूत्करता । उसे देख पकड़ा न जाता । व्याघ्र गुहामें घुसा न जाता । उसी प्रकार ॥ १२ ॥ वैसे कर्म अकरणीय । देखके होता महाभय । उपजाती जो असंशय । बुद्धि सात्विक ॥ १३ ॥ जैसे विष मिश्रित अन्न । देख होता मृत्युका ज्ञान । निषिद्ध कर्ममें भान । होता कर्मका वैसे ॥ १४ ॥ फिर जो बंध भय भरित । होता है निषिद्ध कर्म प्राप्त । निर्विकार जानता निवृत्त । होनेका वह ॥ १५ ॥ ऐसे ही कार्याकार्य विवेक । या प्रवृत्ति-निवृत्तिमापक । जैसे रत्न-पारखी परख । करता जौहरी ॥ १६ ॥ वैसे कार्याकार्य शुद्धि । जानती जो निरवधि । कहाती सात्त्विक बुद्धि । यह तू जान ॥ १७ ॥ यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च । अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥ ३१ ॥ राजसिक बुद्धिका लक्षण— बगुलोके गांवमें जैसे । चलता नीरक्षीर वैसे । या अंधा न जानता जैसे । दिवस रात्र ॥ १८ ॥ कार्य अकार्य कैसे क्या क्या है धर्म अधर्म जो । न जान सकती स्वच्छ जान तू बुद्धि राजस ॥ ३१ ॥ ७५३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

या जिसे फूलोंका मकरंद भाता । अथवा काठ कुरेदना सुहाता । न होती दोनोंमें कोई विसंगतता । भ्रमरके लिये ॥ १९ ॥ वैसे यहां कार्याकार्य । धर्माधर्मका विषय । न होते कोई निर्णय । आचरणसे ॥ ७२० ॥ अजी ! आंखके बिन लेते मोती । उसमें फंसनेकी सदा भीती । कभी सफलता भी मिलती । आश्चर्यसे ही ॥ २१ ॥ वैसे जो अकरणीय होता । सम्मुख आनेसे रह जाता । तभी तो करनेसे छूटता । नहीं तो दोनों एक ॥ २२ ॥ बुद्धि वह उचित अनुचित । नहीं जानती कुछ भी पार्थ । विवाहमें जिस भांति अक्षत । डालते हैं लोग ॥ २३ ॥ अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता । सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥ ३२ ॥ तामसिक बुद्धिके लक्षण— होता जो राजाका राज पथ । चोरोंको होता है विपरीत । उदय होते ही माने रात । राक्षस जैसे ॥ २४ ॥ पुरुष होता है जो भाग्यहीन । उसे कोयला होता गढा धन । ऐसे होकर भी न होता धन । उस जीवको ॥ २५ ॥ वैसे धर्ममात्र जो है केवल । उसकी बुद्धि जो है पाप मल । सत्यको मानती असत्य मूल । तामस बुद्धि ॥ २६ ॥ मानते सब जिसे अर्थ । उसको संपूर्ण अनर्थ । जो जो गुण है व्यवस्थित । उसे मानता दोष ॥ २७ ॥ अथवा मानो श्रुति जात । अनुकरण करते पार्थ । वह सबही विपरीत । मानती वह ॥ २८ ॥

तमसे भरके जो है धर्म माने अधर्मको देखती उल्टा अर्थ वह है बुद्धि तामसी ॥ ३२ ॥ ज्ञानेश्वरी ७७४

इसे किसीसे न पूछकर । तामस मानना धनुर्धर । जिस बुद्धिको धर्मार्थ वैर । क्या करना वह ॥ २९ ॥ ऐसे ये बुद्धिके भेद । किये तुझसे विशद । स्वबोध कुमुद चंद्र । कहे तुझसे ॥ ७३० ॥ अब इसकी जो बुद्धि वृत्ति । सभी कर्मको आधार होती । कैसी वह त्रिविध धृति । कहता हूं तुझे ॥ ३१ ॥ उस धृतिके जो विभाग । तीन होते हैं यदा लिंग । कहता हूं उसे सुभग । सुन तू अब ॥ ३२ ॥ धृत्या यया धारयते मनःप्राणेंद्रियक्रियाः । योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३३ ॥ सात्त्विक धृतिके लक्षण— उदय होते ही दिनकर । मिटता चौर्य सह अंधार । अथवा राजाज्ञा अव्यापार । रोकती जैसे ॥ ३३ ॥ अथवा पवनका जो वेग । चलता रहता है सवेग । मिटते गर्जन सह मेघ । अपने आप ॥ ३४ ॥ या अगस्तके होते दर्शन । सिंधु धारण करता मौन । चंद्रोदयमें कमल-वन । सिमिटते हैं ॥ ३५ ॥ जैसे मदोन्मत्त कुंजर । चलनेमें उठाके पैर । न रखता है भूमिपर । देखके सिंह ॥ ३६ ॥ ऐसे होते हैं जो धीर । उपजते ही अंतर । मनादिकके व्यापार । तजते वहीं ॥ ३७ ॥ इंद्रिय विषयक जो गांठ । आप ही छूटती है सुभट । घुसते मन-मायके पेट- । में दसो जन ॥ ३८ ॥ चलाती जो क्रिया सारी मन इन्द्रिय प्राणकी । समता स्थिरतासे जो वह है धृति सात्त्विक ॥ ३३ ॥ ७७५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

अधोर्ध्वकी मर्यादा तोड़कर । प्राण नवोंकी गांठ बांधकर । बैठा रहता है डूब कर । सुषुम्नामें ॥ ३९ ॥ संकल्प विकल्प पट । खोल होता मन प्रकट । बुद्धिके पीछे जा सुभट । बैठता वह ॥ ४० ॥ इस धृतिके कारण । मन प्राण और करण । स्वचेष्टाका संभाषण । छोड देते हैं ॥ ४१ ॥ मन प्राणादि फिर संपूर्ण । ध्यानके अंतर्गृहमें जान । बंद कर रखता अर्जुन । योगसे वह ॥ ४२ ॥ फिर जो परमात्मचक्रवर्ती । स्वाधीन होनेकी होती निश्चिती । तब तक छूट न होके धृती । बांध रखती उन्हे ॥ ४३ ॥ यहां जो वही धृती । सात्विक कहलाती । ऐसे जो लक्ष्मी-पति । कहता पार्थसे ॥ ४४ ॥ यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन । प्रसंगेन फलाकांक्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥ ३४ ॥ राजसी धृतिके लक्षण— शरीर ही आप मान कर । स्वर्ग संसारके दोनों घर । भोगना चाहता पेट भर । त्रिवर्गोपायसे ॥ ४५ ॥ मनोरथके समुद्र पर । धर्मार्थकामके नांव पर । धैर्य-बलसे क्रिया व्यापार । करता है जो ॥ ४६ ॥ कर्मकी पूंजी जो डालना । उसका चौगुना चाहना । इतना सायास करना । जिसका धैर्य ॥ ४७ ॥ वह धृति है राजस । सुन तू पार्थ विशेष । तीसरी है जो तामस । कहता हूं अब ॥ ४८ ॥ धर्मार्थ काम सारे ही चलाती लाभ देखके । डुबाती फल-आशामें वह है धृति राजसी ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी ७७६

यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च । न विमुंचति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥ ३५ ॥

तामसी धृतिके लक्षण— सभी अधम गुणोंसे । आ जाता है रूप जिसे । कोयला जो कालिमासे । बनता है ॥ ४९ ॥ अजी ! प्राकृत तथा हीन । उसको भी गुणका मान । नाम होता है पुण्यजन । दैत्यका जैसे ॥ ७५० ॥ नवग्रहमें जो है पिंगल । उसको कहते हैं मंगल । वैसे तममें गुण केवल । अविचार मात्र ॥ ५१ ॥ सब दोषोंका आश्रय स्थान । तमसे सान कर अर्जुन । अंगांग जिस नरका मान । बनाये गये हैं ॥ ५२ ॥ आलसको पकड़ बैठता । निद्राका मानो घर ही बनता । पापसे जो सगा ही रहता । छूटे दुःखसे कैसे ॥ ५३ ॥ तन धनके मोहसे अर्जुन । नहीं छूटता भयका कारण । पत्थर न छोड़ता कडापन । उसी प्रकार ॥ ५४ ॥ पदार्थ जातमें आस रखता । इससे शोकका घर बनता । पापसे कभी छूट न सकता । कृतघ्न जैसे ॥ ५५ ॥ जीव-भावसे असंतोष । धरके रखा अहर्निश । इससे मैत्री है विशेष । विषादसे नित ॥ ५६ ॥ ल्हसुन छोडती नहीं दुर्गंधी । तथा कुपथ्यको न छोडती व्याधी । इसी भांति इसको मरणावधी । विषाद् न छूटता ॥ ५७ ॥ तथा तारुण्य वित्त काम । इससे बढ़ता संभ्रम । तमी है भयका आश्रम । बनता वह ॥ ५८ ॥

निद्रा भय न जो छोडे शोक खेद तथा मद । ओढती बुद्धिपे तंद्रा वह है धृति तामस ॥ ३५ ॥

७७७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

आगको न छोड़ता ताप । तथा वैरको नहीं सांप । विश्वका वैरी है वासिप । अखंडित ॥ ५९ ॥ अथवा शरीरको काल । न भूलता कभी निर्मल । वैसे ही तममें अचल । रहता मद ॥ ७६० ॥ ऐसे ये पांच निद्रादिक । तामसके रहते दोष । इसका आधार जो एक । धृति तामस ॥ ६१ ॥ कर्म बुद्धि तथा धृतिका संबंध— कहलाती है ऐसी धृति । जानना तामस सुमति । ऐसा कहता विश्व-पति । धनुर्धरसे ॥ ६२ ॥ इस प्रकार त्रिविध बुद्धि । करती कर्म निश्चय आदि । धृति बनाती उसकी सिद्धि । तदनंतर ॥ ६३ ॥ सूर्यादिसे दीखता पथ । चलना होता पैरोंको नित । किंतु चलना धैर्यसे पार्थ । होता निरंतर ॥ ६४ ॥ वैसे बुद्धि कर्मको दिखाती । इंद्रियां उसको हैं करतीं । करनेमें जो अपेक्षा होती । धैर्यकी सदा ॥ ६५ ॥ तब यह सब तेरे प्रति । कहा है मैंने त्रिविध धृति । इससे होती कर्म निष्पत्ति । होने पर तब ॥ ६६ ॥ त्रिविध कर्मके फल उत्पन्न । होने पर उसे सुख कहते जान । वह भी त्रिविध होता अर्जुन । कर्म परसे ॥ ६७ ॥ फल रूप यह सुख । त्रिगुणसे भिदा देख । मीमांसा इसकी नेक । करूंगा शुद्ध ॥ ६८ ॥ किंतु शुद्ध है वह कैसे कहूंगा । कानोंसे ग्रहण करना चाहेगा । कान तथा हाथका मल लगेगा । इस शुद्धताको ॥ ६९ ॥ इससे करके तू अनादर । श्रवण होता है जो बाहर । सुन अंतःकरण देकर । जीवभावसे ॥ ७७० ॥ ज्ञानेश्वरी ७७८

ऐसे कह करके देव । त्रिविध सुखका प्रस्ताव । निरूपते हैं सावयव । इस प्रकारके ॥ ७१ ॥ सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ । अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखांतं च निगच्छति ॥ ३६ ॥ तीन प्रकारके सुखका विवेचन— कहूंगा सुखत्रय संज्ञा । ऐसी की है मैंने प्रतिज्ञा । कहता हूं सुन तू प्राज्ञ । इस समय ॥ ७२ ॥ जीव करता जब आत्मालिंगन । तब अनुभव करता अर्जुन । उस प्रकारका कराता मैं दर्शन । तुझको अब ॥ ७३ ॥ किंतु मात्राके नापसे जैसे । दिव्यौषधियां लेते हैं वैसे । या रांगेको रस भावनासे । बनाते हैं चांदी ॥ ७४ ॥ अथवा जैसे नूनका नीर । करना हो तो दो चार बार । देने पड़ते उसको मार । पानीके जैसे ॥ ७५ ॥ वैसे प्राप्त सुख लेशसे । जीवको भावना देनेसे । नासता है भावाभ्याससे । जीवका दुःख ॥ ७६ ॥ ऐसा जो आत्म-सुख । हुआ यहां त्रिगुणात्मक । वह भी कहता हूं देख । उसका रूप ॥ ७७ ॥ यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् । तत्सुखं सात्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥ ३७ ॥ सात्विक सुखका लक्षण— जैसे चंदनकी जड़ । सर्पसे रहता अड़ । या निधानका किवाड । पिशाचके हाथमें ॥ ७८ ॥ कहता सुन तू पार्थ सुख तीन प्रकारके । अभ्याससे रमाता जो दिखाता अंत दुःखका ॥ ३६ ॥ आदि जो विषसा तीता अंतमें अमृतोपम । आत्मामें शुद्ध बुद्धीको मिलता सुख सात्विक ॥ ३७ ॥ ७७९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

या स्वर्गके सुंदर भोग । रोक रखते हैं जो याग । अथवा दुःखके प्रसंग । बालत्वमें जैसे ॥ ७९ ॥ होनेमें जैसे दीपकी सिद्धि । कठिनाई घूमकी है आदि । अथवा होती है दिव्योोषधि । जीभको दुःखद ॥ ७८० ॥ इस प्रकार सुन अर्जुन । जिस सुखका उगम-स्थान । यम दम आदिके कारण । होता है विषम ॥ ८१ ॥ करना सभी स्नेहका दमन । वैराग्य उत्पन्न होता अर्जुन । स्वर्ग संसार सीमाका बंधन । रहता है दूर ॥ ८२ ॥ विवेक श्रवणका अति त्रास । तथा व्रताचरण है कर्कश । करते हैं बुद्धि आदिका नाश । रात्रिदिवस ॥ ८३ ॥ मुखसे सुषुम्नाके । ढेर प्राणायामके । पडते हैं ढेर ढेरके । निगलना तब ॥ ८४ ॥ जैसे चक्रवाकके विरहमें होता । या शिशुको स्तनसे छुडानेमें होता । भूखेको थालीसे उठानेमें जो होता । उससे अधिक दुःख ॥ ८५ ॥ माताके सामनेसे बालक । छीनता है काल जब एक । अथवा छूटता है उदक । मीनसे जब ॥ ८६ ॥ वैसे विषयोंका घर है पार्थ । तजनेमें इंद्रियोंको युगांत । होता तब धीर सहता नित । वैराग्यशाली ॥ ८७ ॥ ऐसे जिस सुखका प्रारंभ । दिखाता है काठिण्यका क्षोभ । फिर होता क्षीराब्धिमें लाभ । अमृतसा अंतमें ॥ ८८ ॥ प्रथम आया वैराग्यका गरल । उसको दिया धैर्य शंभुने गला । तभी होता ज्ञानामृतका निर्मल । महदानंद ॥ ८९ ॥ चुभता अगसे भी तीखा । कच्चापन हरे द्राक्षका । पक्तामें जैसे उसका । माधुर्य रहता ॥ ७९० ॥ इस वैराग्यादिका भी वैसा । सुपक्व आत्म-प्रकाशमें वैसा । वैराग्य सह होता हे नाशसा । अविद्याजातका ॥ ९१ ॥ तब जैसे गंगा सागरमें । बुद्धि विलीन होती आत्मामें । अद्वयानंदकी अपनेमें । खुलती खान ॥ ९२ ॥ ज्ञानेश्वरी ७८०

ऐसे स्वानुभव विश्राम। वैराग्य-मूलका परिणाम । उस सुखको सात्विक नाम । दिया गया है ॥ ९३ ॥ विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् । परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥ ३८ ॥ राजस सुखके लक्षण- मिलती जब विषय इंद्रियां । छूता है जो सुख उस समय । दोनों किनारोंको हे धनंजय । उफानमें आकर ॥ ९४ ॥ अधिकारी आते जब गांव । होता है जब जैसा उत्सव । अथवा ऋण लेके विवाह । विस्तार होता ॥ ९५ ॥ या रोगीकी जीभमें जैसे । केला-बूरा भाता है वैसे । बचनाग पहले जैसे । लगता मीठा ॥ ९६ ॥ प्रवास-चौर्यके पहले मित्र । या हाट बातका कलत्र । होते उनके विनोद विचित्र । उसी प्रकार ॥ ९७ ॥ वैसे जो विषयेंद्रियोंका मिलन । करता जीवके सुखमें पोषण । फिर जैसे चट्टानको रत्न मान । मरता हंस जैसे ॥ ९८ ॥ वैसे खर्चके सारा उत्पन्न । मिटता जीवन संपन्न । क्षीण होता सुकृतका धन । जीवका सारा ॥ ९९ ॥ तथा जब सब भोग मिटता । तब वह मात्र स्वप्नसा होता । फिर केवल मात्र जो रहता । हानिका भार ॥ ८०० ॥ विपत्ति है ऐसे जो सुख । ऐहिक परिणाम देख । परमें बनके जो विष । उलटता है ॥ १ ॥ करनेसे लाड़ विषयोंके । जला करके खेत धर्मके । भोग किये नाना उत्सवके । विषयोंसे वहां ॥ २ ॥ पहला लगता मीठा अंतमें विष मारक । विषय योगसे पाती इंद्रियां सुख राजस ॥ ३८ ॥ ७८१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

पातकोंमें तब आता बल । नरकमें देते हैं वे खल । उस सुखने किया है छल । अंतमें ऐसे ॥ ३ ॥ बछनाग विष है मधुर । किंतु अंतमें मारक क्रूर । वैसे पहले होता मधुर । अंतमें कटु ॥ ४ ॥ यह सुख निःसंदेह पार्थ । रजो गुणसे बना है सार्थ । इसीलिये न छूना सुखार्थ । इसका अंग ॥ ५ ॥ यदग्रे चानुबंधे च सुखं मोहनमात्मनः । निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ ३९ ॥ तामसिक सुखके लक्षण— करके अपेयका पान । तथा अखाद्यका भोजन । और पर-स्त्री-सन्निधान । देता है जो सुख ॥ ६ ॥ या दूसरोंका कर संहार । और कर परस्वापहार । होता है सुखका अवतार । भाटोंके मुखसे ॥ ७ ॥ आलस्यमें होता जिसका पोषण । या निद्रामें होते हैं अनुभव जान । जिसका आद्यंत भुलाता अर्जुन । अपने पथको ॥ ८ ॥ जो कुछ है वह पार्थ । तामस मान यथार्थ । इसमें सुखकी बात । असंभाव्य ॥ ९ ॥ मूलमें कर्मके तीन प्रकार । इससे सुख भी तीन प्रकार । यह सब तुझे शास्त्रानुसार । कह दिया मैंने ॥ ८१० ॥ कर्ता कर्म तथा कर्म-फल । यह त्रिपुटि एक केवल । इसके बिना न सूक्ष्म-स्थूल । कुछ भी यहां ॥ ११ ॥ तथा यह जो त्रिपुटि । तीनों गुणोंमें किरीटी । बुनी गयी है जो पर्टी । तंतु समान ॥ १२ ॥ निद्रा प्रमाद आलस्य आत्माको घेरके सदा । आदि औ' अंतमें जो है भुलाता सुख तामस ॥ ३९ ॥ ज्ञानेश्वरी ७८२

न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः । सत्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥ ४० ॥ प्रकृतिके ये गुण सर्वव्यापी और सबको बंधनकारक हैं— तभी जो प्रकृतिसे प्रकट होता । तथा सत्वादिकसे नहीं बंधता । स्वर्ग या मृत्यु लोकमें नहीं होता । ऐसा कुछ भी कहीं ॥ १३ ॥ उनके बिना कहीं कंबल । मृत्तिका बिन कर्दम गोल । अथवा जल बिन कल्लोल । होता है क्या ॥ १४ ॥ वैसे कहीं गुणके बिन । नहीं है सृष्टिकी रचना । ऐसे नहीं हुवा अर्जुन । प्राणिजातमें ॥ १५ ॥ इसीलिये यह सकल । तीन गुणोंसे है केवल । बनाया गया है अखिल । ऐसे जान ॥ १६ ॥ गुणोंसे देवोंके तीन प्रकार । तथा लोकके भी तीन आकार । गुणोंसे समाजको दिये चार । व्यापार वर्णके ॥ १७ ॥ ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप । कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥ ४१ ॥ वर्ण-व्यवस्थाका आधार भी तीन गुण ही है— वही जो चार वर्ण । पूछेगा तू कौन कौन । वहां जो मुख्य ब्राह्मण । आधार ही है ॥ १८ ॥ यहां जो क्षत्रिय वैश्य दोन । मानमें ब्राह्मणोंके समान । योग्य हैं वे वैदिक विधान । करनेमें जो ॥ १९ ॥ शूद्रका है चतुर्थ वर्ण । वेदसे नाता नहीं जान । तभी त्रिवर्णके आधीन । उसकी वृत्ति ॥ ८२० ॥ पृथ्वी पर यहां या तो देवोंमें स्वर्गमें कहीं । प्रकृतिके गुणोंमेंसे कोई भी छूटता नहीं ॥ ४० ॥ ब्राह्मणादिक वर्णोंका किया कर्म विभाजन । गुण है जिसके जैसे उनके अनुसारही ॥ ४१ ॥ ७८३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग.