भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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दोहावली १९१ कारण] पुलकावलिरूपी [ शुभ ] अङ्कुर उत्पन्न होते हैं और तभी उसमें [ भगवत्प्रेमरूपी] धानकी खेती लहलहाती है ॥५६८॥ तुलसी सहित सनेह नित सुमिरहु सीता राम । सगुन सुमंगल सुभ सदा आदि मध्य परिनाम ॥५६९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि नित्य-निरन्तर भगवान् श्रीसीतारामजीके सुन्दर सगुण स्वरूपका प्रेमसहित स्मरण-ध्यान करते रहो; इससे आदि, मध्य और अन्तमें सदा ही अच्छे शकुन, परम मङ्गल और कल्याण होगा ॥५६९॥ पुरुषारथ स्वारथ सकल परमारथ परिनाम । सुलभ सिद्धि सब साहिबी सुमिरत सीता राम ॥५७०॥ भावार्थ—श्रीसीतारामजीका स्मरण करते ही मनुष्यके लिये सभी सिद्धियाँ और सबपर स्वामित्व सुलभ हो जाते हैं। तथा सभी तरहके स्वार्थ (लौकिक कार्य), पुरुषार्थ (आध्यात्मिक कार्य) सफल होते हैं और अन्तमें परमार्थ (श्रीभगवान्) की प्राप्ति होती है ॥५७०॥ दोहावलीके दोहोंकी महिमा मनिमय दोहा दीप जहँ उर घर प्रगट प्रकास । तहँ न मोह तम भय तमी कलि कज्जली बिलास ॥५७१॥ भावार्थ—जिसके हृदयरूपी घरमें इन दोहोंरूपी मणिमय दीपकका प्रकाश प्रकट होगा, वहाँ मोहरूपी अन्धकार, भयरूपी रात्रि और कलिकालरूपी कालिमाका विलास नहीं हो सकता ॥५७१॥ का भाषा का संस्कृत प्रेम चाहिए साँच । काम जु आवै कामरी का लै करिअ कुमाच ? ॥५७२॥