भारतकोश
दृग्-दृश्य विवेक (स्वामी भारतीतीर्थ - सान्वय हिन्दी व्याख्या)

दृग्-दृश्य विवेक (स्वामी भारतीतीर्थ - सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Drig Drishya Viveka Hindi

स्वामी भारतीतीर्थ / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Drig-Drishya Viveka with Sanskrit Shlokas and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished34 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 34 में से

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दृग्दृश्य विवेकDrig Drishya Vivek

२६

स्वानुभूतिरसावेशाद्
दृश्यशब्दावुपेक्ष्य तु।
निर्विकल्पस्समाधिस्स्यात्
निवातस्थित दीपवत्॥

दृश्य और शब्दानुविद्ध सविकल्प समाधियों के हेतुभूत तत्त्व-विवेक के फलस्वरूप जब एक तरफ स्वानुभूति के दिव्यरस का अत्यधिक आविर्भाव होता है, तथा दूसरी तरफ विवेकवशात् ही समाहित अवस्था के रस से भी निरपेक्ष होकर निवातस्थ दीप के समान स्थित रहते हैं, तब निर्विकल्प समाधि सहजता से प्राप्त हो जाती है।

The Nirviklpa-Samadhi is that in which the mind becomes steady like the light kept in a place free from wind and in which the student becomes indifferent to both objects and words on account of his complete absorption in the bliss of the realization of the Self.


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