भारतकोश
दृग्-दृश्य विवेक (स्वामी भारतीतीर्थ - सान्वय हिन्दी व्याख्या)

दृग्-दृश्य विवेक (स्वामी भारतीतीर्थ - सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Drig Drishya Viveka Hindi

स्वामी भारतीतीर्थ / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Drig-Drishya Viveka with Sanskrit Shlokas and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished34 पृष्ठ

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दृग्दृश्य विवेक | Drig Drishya Vivek


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हृदीव बाह्यदेशेऽपि
यस्मिन् कस्मिंश्च वस्तुनि ।
समाधिराद्यस्सन्मात्रात्
नामरूपपृथक्कृतिः ।।

जिस प्रकार अपने मन में (दृग्-दृश्य विवेक से प्रारम्भ कर समाधि तक गति हुई) उसी प्रकार बाह्य देश में भी किसी भी विषय को निमित्त बनाकर सर्वप्रथम दृश्यानुविद्ध समाधि सिद्ध करने हेतु विषय के अन्तर्गत सत्स्वरूपता से नामरूप को पृथक् करना चाहिये।

Like the samadhi prompted by drg-dryshya, one should now practice samadhi using any external objects. Here the firsst step is to discriminate between names & forms and pure existence.


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