भारतकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

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( ११० ) गणेशगीता अ० ११. श्रीगणेशजी बोले हे राजन्! कायवचनमन इनभेदोंसे तपभी तीन प्रकारकाहै ऋजुता, आर्जव, पवित्रता, ब्रह्मचर्य, अहिंसा १ गुरुविज्ञद्विजातीनां पूजनं चासुरद्विषाम् ॥ स्वधर्मपालनं नित्यं कायिकं तप ईदृशम् ॥२॥ गुरु, पण्डित, ब्राह्मण देवतोंका पूजन करना, नित्य स्वधर्म पालन करना, यह कायिक तप कहा है ॥ २ ॥ मर्मास्पृक्च प्रियं वाक्यमनुद्वेगं हितं ऋतम् ॥ अधितिर्वेदशास्त्राणां वाचिकं तप ईदृशम् ॥३॥ हृदयग्राहक प्रिय वचन बोलना, उद्वेग रहित हितकारी और सत्य भाषण करना, वेदशास्त्रोंका पढना यह वचनका तप कहा है ॥ ३ ॥ अन्तःप्रसादःशान्तत्वं मौनमिन्द्रियनिग्रहः ॥ निर्मलाशयता नित्यं मानसं तप ईदृशम् ॥४॥ अन्तःकरण प्रसन्न, शान्ति, मौन, जितेन्द्रियता, सदा निर्मल भाव रखना, यह मानसिक तप है ॥ ४ ॥ अकामतः श्रद्धया च यत्तपः सात्त्विकं च तत् ॥ ऋद्धयै सत्कारपूजार्थं सदम्भं राजसं तपः ॥५॥

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