गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत। ( १११ ) अकामता और श्रद्धासे जो तप किया जाता है,वह सात्त्विक है,ऐश्वर्य सत्कार पूजाके निमित्त और दम्भ सहित जो किया जाता है वह राजसी तप है ॥ ५॥ तदस्थिरं जन्ममृती प्रयच्छति न संशयः ॥ परात्मपीडकं यच्च तपस्तामसमुच्यते ॥ ६ ॥ रजोगुणी तप जन्म मृत्यु और अस्थिरताका देनेहारा है और जिसमें दूसरेको पीडा हो वह तमोगुणी तप है ॥ ६॥ विधिवाक्यप्रमाणार्थं सत्पात्रे देशकालतः ॥ श्रद्धया दीयमानं यद्दानं तत्सात्त्विकं मतम् ॥७॥ विधियुक्त प्रमाणपूर्वक देशकालमें श्रद्धापूर्वक जो दान दिया जाता है वह सात्त्विक दान है ॥ ७ ॥ उपकारं फलं वापि काङ्क्षद्भिर्दीयते नरैः ॥ क्लेशतो दीयमानं वा भक्त्या राजसमुच्यते ॥८॥ और जो उपकार वा फलकी कामनासे मनुष्य दान करते हैं ऐसा दान जो क्लेश अथवा भक्ति किसी प्रकारसे दिया वह राजसी दान कहाता है ॥ ८ ॥ अकालदेशतोऽपात्रेऽवज्ञया दीयते तु यत् ॥ असत्काराच्च यद्दत्तं तद्दानं तामसं स्मृतम् ॥९॥