गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 118, कुल 130 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( ११७ ) अन्तर्बाह्येन्द्रियाणां च वश्यत्वमार्जवं क्षमा ॥ नानातपांसि शौचं च द्विविधं ज्ञानमात्मनः २८ बाह्य और अन्तर इन्द्रियोंका वश करना, सरलता, क्षमा, अनेक प्रकारके तप,पवित्रता,दोनों प्रकार आत्माका ज्ञान २८॥ वेदशास्त्रपुराणानां स्मृतीनां ज्ञानमेव च ॥ अनुष्ठानं तदर्थानां कर्म ब्राह्ममुदाहृतम् ॥ २९ ॥ वेद शास्त्र पुराण और स्मृतियोंका ज्ञान होना और उनके अर्थोंका अनुष्ठान करना, यह ब्राह्मणके कर्म हैं ॥ २९ ॥ दार्ढ्यं शौर्यं च दाक्ष्यं च युद्धे पृष्ठाप्रदर्शनम् ॥ शरण्यपालनं दानं धृतिस्तेजः स्वभावजम् ३० दृढता, शूरता, चतुरता, युद्धसे पलायन न करना, शरणा- गतकी रक्षा, दान, धैर्य, स्वाभाविक तेज ॥ ३० ॥ प्रभुता मन औन्नत्यं सुनीतिर्लोकपालनम् ॥ पञ्चकर्माधिकारित्वं क्षात्रं कर्म समीरितम् ३१॥ प्रभुता,मनकी उदारता,अच्छीनीति, लोकपालन इन पांच- कर्मोंमें अधिकार यह क्षत्रियोंका स्वाभाविक कर्म है ॥ ३१ ॥