गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 117, कुल 130 में से
संदर्भ में पढ़ें(११६) गणेशगीता अ० ११. और अन्तमें विषकी समान फल दे, उसे राजसी सुख कहते हैं, और जो तन्द्रा तथा प्रमादसे उत्पन्न हुआ और जो आलस्यसे हुआ है ॥ २४ ॥ सर्वदा मोहकं स्वस्य सुखं तामसमीदृशम् ॥ न तदस्ति यदेतैर्यन्युक्तं स्यात्त्रिविधैर्गुणैः॥२५॥ तथा जो अपनेको सदा मोह करता है, उसका नाम तामसी सुख है, ऐसा कोई भी प्राणी नहीं जो इन तीनों गुणोंसे मुक्त हो ॥ २५ ॥ राजन्ब्रह्मापि त्रिविधमोंतत्सदिति भेदतः ॥ त्रिलोकेषु त्रिधाभूतमखिलं भूप वर्तते ॥ २६ ॥ हे राजन् ! ब्रह्म भी तौ ( ॐ ) ( तत् ) ( सत् ) इस भेदसे तीन प्रकारका है, हे राजन् ! वह तीन प्रकारसे ब्रह्म त्रिलोकीमें व्याप्त है ॥ २६ ॥ ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्राः स्वभावाद्भिन्नकर्मणः ॥ तानि तेषां तु कर्माणि संक्षेपात्तेऽधुना वदे ॥२७॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, यह स्वभावसेही भिन्न २ कर्म करनेवाले हैं, इनके कर्म संक्षेपसे मैं तुमसे कहताहूं ॥ २७ ॥