भारतकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेत । ( १५ ) कुर्व्वन्ति सततं कर्म जन्ममृत्युफलप्रदम् ॥ स्वर्गैश्वर्यरता ध्वस्तचेतना भोगवृद्धयः ॥३४॥ इसी कारण वे जन्म और मृत्युके फल देनेहारे कर्मोंको सदा करते रहते हैं वे स्वर्गके ऐश्वर्योंमेंही लगे रहते हैं, उन भोगबुद्धिवालोंकी चेतना नष्ट होजाती है ॥ ३४ ॥ सम्पादयन्ति ते भूप स्वात्मना निजबन्धनम् ॥ संसारचक्रं युञ्जन्ति जडाः कर्मपरा नराः॥३५॥ हे राजन् ! वे आपही अपने निमित्त बंधन बनाते हैं, मूढ और कर्मपरायण मनुष्य संसारचक्रमें पडते हैं ॥ ३५ ॥ यस्य यद्विहितं कर्म तत्कर्तव्यं मदर्पणम् ॥ ततोऽस्य कर्मबीजानामुच्छिन्नाः स्युर्महांकुराः ३६ जिसको जो कर्म विधान किया है, वह मेरे अर्पण करना चाहिये, तब इन प्राणियोंके कर्मरूप बीजोंके महा अंकुर नष्ट हों ॥ ३६ ॥ चित्तशुद्धिश्च महती विज्ञानसाधिका भवेत् ॥ विज्ञानेन हि विज्ञातं परं ब्रह्म मुनीश्वरैः ॥३७॥ चित्तकी शुद्धि होनेसेही विज्ञानकी प्राप्ति होती है, विज्ञानके द्वाराही ऋषियोंने परब्रह्मको जाना है ॥ ३७ ॥