भारतकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

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( १६ ) गणेशगीता-अ १. तस्मात्कर्माणि कुर्वीत बुद्धियुक्तो नराधिप ॥ न त्वकर्मा भवेत्कोऽपि स्वधर्मत्यागवांस्तथा ३८ हे राजन् ! इसकारण जो कर्मकरे वह बुद्धियुक्त है अर्थात् मेरे अर्पण करे, कारण कि जिस कर्मका त्याग होनेसे स्वध- र्मका त्याग होता है वह त्याग उचित नहीं है ॥ ३८ ॥ जहाति यदि कर्माणि ततः सिद्धिं न विंदति ॥ आदौ ज्ञानेनाधिकारः कर्मण्येव स युज्यते३९॥ जो कर्मका त्याग करेगा तौ चित्तशुद्धि नहीं होगी, चित्त- शुद्धि न होनेसे ज्ञानकी प्राप्ति नहीं होगी, और सिद्धिकीभी प्राप्ति नहीं होगी, विना चित्तशुद्धिके ज्ञानमें अधिकार नहीं है, इसकारण प्रथम आसक्तिरहित होकर कर्म करना उचित है ३९॥ कर्मणा शुद्धहृदयोऽभेदबुद्धिमुपैष्यति ॥ स च योगः समाख्यातोऽमृतत्वाय हि कल्पते४० कर्मसे शुद्ध हृदय होकर अभेद बुद्धिको प्राप्त होता है, उसीका नाम योग है, जिससे प्राणी अमर होजाता है ॥ ४० ॥ योगमन्यं प्रवक्ष्यामि शृणु भूप तदुत्तमम् ॥ पशौ पुत्रे तथा मित्रे शत्रौ बन्धौ सुहृज्जने॥४१॥