गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( १७ ) हे राजन् ! मैं और भी उत्तम योग कहताहूं,तुम उसे सुनो, पशु, मित्र, पुत्र, शत्रु, बंधु तथा सज्जन पुरुष ॥ ४१ ॥ बहिर्दृष्ट्या च समया हृत्स्थयालोकयेत्पुमान् ॥ सुखे दुःखे तथाऽमर्षे हर्षे भीतौ समो भवेत्॥४२॥ इन सबमें समान दृष्टि करनी चाहिये, बाहर भीतर एकसी दृष्टि रखनी, सुख, दुःख, क्रोध, हर्ष, भय इनमें समान रहना चाहिये ॥ ४२ ॥ रोगाप्तौ चैव भोगाप्तौ वा जये विजयेऽपि च ॥ श्रियोऽयोगे च योगे च लाभालाभेमृतावपि॥४३॥ रोगकी प्राप्ति हो, चाहे भोगकी प्राप्तिहो, जयहो, विजयहो लक्ष्मीकी प्राप्ति, अप्राप्ति, हानि, लाभ, जन्म, मरण, इन सबमें मनको समान रखना उचित है ॥ ४३ ॥ समो मां वस्तुजातेषु पश्यन्नन्तर्बहिः स्थितम् ॥ सूर्ये सोमे जले वह्नौ शिवे शक्तौ तथानिलेज४४ सम्पूर्ण वस्तुओंमें समान भावसे बाहर भीतर मुझे स्थित जानना, सूर्य, चन्द्रमा, जल, अग्नि, शिव, शक्ति, वायु॥४४॥ द्विजे हृदे महानद्यां तीर्थे क्षेत्रेऽघनाशिनि ॥ विष्णौ च सर्वदेवेषु तथा यक्षोरगेषु च ॥४५॥