गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १८ ) गणेशगीता-अ० १. ब्राह्मण, छोटे सरोवर,महानदी,तीर्थ पापहारी क्षेत्र, विष्णु, सम्पूर्ण देवता, यक्ष, उरग ॥ ४५ ॥ गन्धर्वेषु मनुष्येषु तथा तिर्यग्भवेषु च ॥ सततं मां हि यः पश्येत्सोऽयं योगविदुच्यते ४६ गन्धर्व, मनुष्य, तिरछे चलनेहारे जीव, इन सबमें जो मुझे सदा समान दृष्टिसे देखता है वही योगका जाननेहारा कहाता है ॥ ४६ ॥ संप्राहृत्य स्वार्थेभ्य इन्द्रियाणि विवेकतः ॥ सर्वत्र समताबुद्धिः स योगो भूप मे मतः ॥४७॥ हे राजन् ! जो ज्ञानद्वारा इन्द्रियोंको स्वार्थसे हटाकर सर्वत्र समान बुद्धि रखता है, वही योग मानागया है ॥ ४७॥ आत्मानात्मविवेकेन या बुद्धिर्दैवयोगतः ॥ स्वधर्मासक्तचित्तस्य तद्योगो योग उच्यते॥४८॥ अपने धर्ममें आसक्त चित्त प्राणीकी दैवयोगसे जो आत्मा और अनात्माके विचारकी बुद्धि उत्पन्न होती है, उस बुद्धिके योगकाही नाम योग है ॥ ४८ ॥ धर्माधर्मौ जहातीह तया त्यक्त उभावपि ॥ अतो योगाय युञ्जीत योगो वैधेषु कौशलम्४९