भारतकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 130 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 21

( २० ) गणेशगीता-अ० १. मानसानखिलान्कामान्यदा धीमांस्त्यजेत्प्रिय । स्वात्मनि स्वेन संतुष्टःस्थिरबुद्धिस्तदोच्यते ५३ हे प्रिय ! जब यह बुद्धिमान् मनके सम्पूर्ण कामोंको त्यागन कर दे, अपने आत्मामें आपहीसे संतुष्ट हो तब यह स्थिर- बुद्धि कहाता है ॥ ५३ ॥ वितृष्णः सर्वसौख्येषु नोद्विग्नो दुःखसंगमे ॥ गतसाध्वसरुड्रागः स्थिरबुद्धिस्तदोच्यते ॥५४॥ किसीप्रकारके भी संसारी सुखोंमें तृष्णा न करनी,दुःखमें उद्विग्न न होना, भय, क्रोध और राग न होना यही स्थिर- बुद्धिका लक्षण है ॥ ५४ ॥ यथाऽयं कमठोऽङ्गानि संकोचयति सर्वतः ॥ विषयेभ्यस्तथा खानि संकर्षेद्योगतत्परः ॥५५॥ जिसप्रकारसे कछुआ सब ओरसे अपने अंग सिकोड लेता है इसीप्रकारसे योगीको उचित है कि विषयोंसे इंद्रियोंको खींचे५५ व्यावर्तन्तेऽस्य विषयास्त्यक्ताहारस्यवार्ष्मणः ॥ विना रागं च रागोऽपि दृष्ट्वा ब्रह्म विनश्यति५६ भोजन त्यागनेवालेके विषय नष्ट होजाते हैं परन्तु उनका