गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( २३ ) विना श्रद्धा नहीं, श्रद्धाके विना शान्ति नहीं और शान्तिके विना सुख नहीं होता ॥ ६३ ॥ इंद्रियाणांन्विचरतो विषयाननुवर्तते ॥ यन्मनस्तन्मतिं हन्यादप्सु नावं मरुद्यथा॥६४॥ पवन जिसप्रकार नावको जलमें डुबो देती है वैसेही मन विषयोंमें विचरनेवाले अवशीभूत इंद्रियरूपी घोडोंमेंसे जिसके अनुकूल चलता, वही उसकी प्रज्ञाको हर लेता है ॥ ६४ ॥ या रात्रिः सर्वभूतानां तस्यां निद्राति नैव सः॥ न स्वपंतीह ते यत्र ता रात्रिस्तस्य भूमिप ६५ अज्ञानसे आच्छादित सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये जो आत्म- ज्ञान रात्रि स्वरूप है, उसमें इन्द्रिय वश करनेहारे संयमी योगी जागते हैं, और जिस विषयबुद्धिमें संपूर्ण प्राणी जागते हैं, वह विषय भोग ज्ञानियोंके लिये रात्रि स्वरूप है ॥ ६५ ॥ सरितां पतिमायांति वनानि सर्वतो यथा ॥ आयांति यं तथा कामा न स शांतिं क्वचिल्लभेत् ६६ जिसप्रकारसे सब नदियें और जल समुद्रमें प्रवेश कर जाते हैं और उसकी तृप्ति नहीं होती, इसीप्रकार सब कामना पूर्ण होनेवालेको भी शान्ति नहीं होती ॥ ६६ ॥