गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २४ ) गणेशगीता-अ० १. अतस्तानीह संरुध्य सर्वतः खानि मानवः ॥ स्वस्वार्थेभ्यः प्रधावंति बुद्धिरस्य स्थिरा तदा ६७ इसकारण प्राणीको उचित है कि, सब प्रकारसे विषयोंकी ओर धावमान होती हुई इन्द्रियोंको वशमें करे, तब इसकी बुद्धि स्थिर हो ॥ ६७ ॥ ममताहंकृती त्यक्त्वा सर्वान्कामांश्च यस्त्यजेत् ॥ नित्यं ज्ञानरतो भूत्वा ज्ञानान्मुक्तिं स यास्यति॥ जो ममत्व अहंकार और सब कामनाओंका त्याग करताहै, नित्य ज्ञानमें मग्न रहताहै वह ज्ञानसे मुक्तिको प्राप्त होजाता है ६८ एवं ब्रह्मधियं भूप यो विजानाति दैवतः ॥ तुर्यामवस्थां प्राप्यापि जीवन्मुक्तिं प्रयास्यति ६९ ॐतत्सादीति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासुयोगामृता- र्थशास्त्रे श्रीमन्महागणेशपुराणे उत्तरखण्डे बाल- चरिते गजाननवरेण्यसंवादे सांख्यसारार्थ- योगो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥