भारतकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेत । (२५) हे राजन् ! जो दैवगतिसे इस ब्रह्मज्ञानयुक्त बुद्धिको प्राप्त हो जाता है वह तुर्या अवस्थाको प्राप्त होकर जीवन्मुक्त हो जाता है ॥ ६९ ॥ ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृतार्थ- शास्त्रे श्रीमन्महागणेशपुराणे उत्तरखण्डे बालचरिते गजाननवरेण्यसंवादे पण्डितज्वालाप्रसादमिश्र- कृतभाषाटीकायां सांख्यसारार्थयोगो- नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ वरेण्य उवाच । ज्ञाननिष्ठा कर्मनिष्ठा द्वयं प्रोक्तं त्वया विभो । अवधार्य वदैकं मे निःश्रेयसकरं नु किम् ॥ १ ॥ वरेण्यने कहा हे भगवन् ! ज्ञाननिष्ठ और कर्मनिष्ठ आपने दोनोंका वर्णन किया इसमें मुझे संदेह होता है, इसकारण आप दोनोंमें एक निश्चयकर जो कल्याणदायक हो सो कहिये ॥१॥ गजानन उवाच । अस्मिंश्चराचरे स्थित्यौ पुरोक्ते द्वे मया प्रिय ॥ सांख्यानां बुद्धियोगेन वैधयोगेन कर्मणाम् ॥२॥ श्रीगजानन बोले कि हे राजन् ! इस चराचर जगत्में दो प्रकारकी स्थिति है, ज्ञान योगसे सांख्य शास्त्र जाननेवालोंकी और कर्मयोगसे कर्मके अधिकारी चित्त शुद्धिरखनेवाले योगियोंकी ॥ २ ॥