गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
भाषाटीकासमेत । (२५) हे राजन् ! जो दैवगतिसे इस ब्रह्मज्ञानयुक्त बुद्धिको प्राप्त हो जाता है वह तुर्या अवस्थाको प्राप्त होकर जीवन्मुक्त हो जाता है ॥ ६९ ॥ ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृतार्थ- शास्त्रे श्रीमन्महागणेशपुराणे उत्तरखण्डे बालचरिते गजाननवरेण्यसंवादे पण्डितज्वालाप्रसादमिश्र- कृतभाषाटीकायां सांख्यसारार्थयोगो- नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ वरेण्य उवाच । ज्ञाननिष्ठा कर्मनिष्ठा द्वयं प्रोक्तं त्वया विभो । अवधार्य वदैकं मे निःश्रेयसकरं नु किम् ॥ १ ॥ वरेण्यने कहा हे भगवन् ! ज्ञाननिष्ठ और कर्मनिष्ठ आपने दोनोंका वर्णन किया इसमें मुझे संदेह होता है, इसकारण आप दोनोंमें एक निश्चयकर जो कल्याणदायक हो सो कहिये ॥१॥ गजानन उवाच । अस्मिंश्चराचरे स्थित्यौ पुरोक्ते द्वे मया प्रिय ॥ सांख्यानां बुद्धियोगेन वैधयोगेन कर्मणाम् ॥२॥ श्रीगजानन बोले कि हे राजन् ! इस चराचर जगत्में दो प्रकारकी स्थिति है, ज्ञान योगसे सांख्य शास्त्र जाननेवालोंकी और कर्मयोगसे कर्मके अधिकारी चित्त शुद्धिरखनेवाले योगियोंकी ॥ २ ॥
( २६ ) गणेशगीता-अ० २. अनारम्भेण वैधानां निष्क्रियः पुरुषो भवेत् ॥ न सिद्धियाति संत्यागात्केवलात्कर्मणो नृप॥३॥ कर्मोंके आरंभ न करनेसे यह पुरुष निष्क्रिय हो जाता है, हे राजन् ! केवल कर्मोंहीके त्यागनेसे सिद्धि नहीं होती ॥३॥ कदाचिदक्रियः कोऽपि क्षणं नैवावतिष्ठते ॥ अस्वतंत्रः प्रकृतिजैर्गुणैः कर्म च कार्यते ॥४॥ किसी दशामें क्षणमात्रभी कर्मविना किये कोई नहीं रह सकता है, राग द्वेषादि स्वाभाविक गुण सबको ही अवश करके कर्म कराते हैं, तत्त्वज्ञान होनेसे प्रथम कर्म त्यागनेसे चित्तकी क्रिया नहीं हो सकती ॥ ४ ॥ कर्मकारीन्द्रियग्रामं नियम्यास्ते स्मरन्पुमान् ॥ तद्गोचरान्मंदचित्तो धिगाचारः स भाष्यते ॥५॥ जो कर्म करनेवाला, इन्द्रियोंको मनहीं मनमें रोककर इन्द्रियोंके विषयोंका स्मरण करता है, उस दुरात्माको तुच्छ आचारवाला कहा जाता है ॥ ५ ॥ तद्ग्रामं संनियम्यादौ मनसा कर्म चारभेत् ॥ इंद्रियैः कर्मयोगं यो वितृष्णः स परो नृप ॥६॥ और जो मनसे इन्द्रियोंको संयम करके, कर्म इन्द्रियोंसे
भाषाटीकासमेत । ( २७ ) कर्मयोगका अनुष्ठान करता है, वही फलकी कामना न करनेवाला ही श्रेष्ठ है ॥ ६ ॥ अकर्मणः श्रेष्ठतमं कर्मानीहाकृतं तु यत् ॥ वर्ष्मणः स्थितिरप्यस्याकर्मणो नैव सेत्स्यति॥७॥ कर्म न करनेसे फलकी कामना न करके कर्मका करना श्रेष्ठ है कारण कि सब कर्मोंसे रहित होनेसे शरीरयात्रा भी नहीं हो सकती ॥ ७ ॥ असमर्प्य निबध्यन्ते कर्म तेन जना मयि ॥ कुर्वीत सततं कर्मानिशोऽसंगो मदर्पणम् ॥८॥ प्राणी कर्मोंका फल मुझमें जो समर्पण नहीं करते, इसी कारण वे बंधनमें पडते हैं, इस कारणसे निष्काम कर्मका अनु- ष्ठान करना उचित है, और जो करो सब ईश्वरार्पण करो और असंग अर्थात् उनमें आसक्ति मत करो ॥ ८ ॥ मदर्थे यानि कर्माणि तानि बध्नन्ति न क्वचित्॥ सवासनमिदं कर्म बध्नाति देहिनं बलात् ॥९॥ जो कर्म मेरे निमित्त किये जाते हैं वे बन्धनके निमित्त नहीं होते, जो वासनापूर्वक कर्म हैं वे ही बलसे प्राणीको बांधते हैं ॥ ९ ॥
( २८ ) गणेशगीता-अ० २. वर्णान्सृष्ट्वावदं चाहं सयज्ञांस्तान्पुरा प्रिय ॥ यज्ञेन ऋध्यतामेष कामदः कल्पवृक्षवत् ॥१०॥ पूर्व कालमें मैने यज्ञरूपी नित्यकर्मकेही साथ साथ मनु- ष्योंको रचकर कहा-हे मनुष्यो ! तुम वृद्धिको प्राप्त हो, यह क्रिया तुम्हारी इष्ट सिद्धिकी देनेवाली हो ॥ १० ॥ सुरांश्चान्नेन प्रीणध्वं सुरास्ते प्रीणयन्तु वः ॥ लभत्वं परमं स्थानमन्योन्यप्रीणनात्स्थिरम् ११ तुम देवताओंको अन्नसे तृप्त करो, देवता तुमको वर्षा आदिसे प्रसन्न करेंगे, इसप्रकार परस्पर वृद्धि करते हुए तुम और देवता सब श्रेष्ठ स्थानको प्राप्त हो ॥ ११ ॥ इष्टा देवाः प्रदास्यन्ति भोगानिष्टान्सुतर्पिताः ॥ तैर्दत्तांस्तानरस्तेभ्योऽदत्त्वाभुङ्क्ते स तस्करः १२ देवता प्रसन्न होकर तुम्हारे मनोवांछित मनोरथोंको पूर्ण करेंगे, उन देवतोंके दिये पदार्थोंसे उनका आराधन किये विना जो भोग भोगता है वह चोर है ॥ १२ ॥ हुतावशिष्टभोक्तारो मुक्ताः स्युः सर्वपातकैः ॥ अदन्त्येनो महापापा आत्महेतोःपचन्ति ये १३ जो देवताका आराधनरूप यज्ञ करके अवशिष्ट अन्न
भाषाटीकासमेत । (२९) भोजन करते हैं, वे सब पापोंसे मुक्त होते हैं, और जो अपने निमित्त भोजन करते हैं, वे पापी मानो पापही भोजन करते हैं ॥ १३ ॥ ऊर्जो भवन्ति भूतानि देवादन्नस्य संभवः ॥ यज्ञाच्च देवसंभूतिस्तदुत्पत्तिश्च वैधतः ॥ १४ ॥ अन्नसे ही प्राणी उत्पन्न होते हैं, और अन्न वर्षासे उत्पन्न होता है और वर्षा यज्ञसे उत्पन्न होती है, और कर्मसे यज्ञकी उत्पत्ति होती है ॥ १४ ॥ ब्रह्मणो वैधमुत्पन्नं मत्तो ब्रह्मसमुद्भवः ॥ अतोयज्ञेचविश्वस्मिन्स्थितं मांविद्धि भूमिप १५ कर्म ब्रह्मसे उत्पन्न होता है, इस कारण हे राजन् ! इस यज्ञमें और विश्वमें स्थित आप मुझे जानिये ॥ १५ ॥ संसृतीनां महाचक्रं क्रामितव्यं विचक्षणैः ॥ स मुदा प्रीणते भूपेन्द्रियक्रीडोऽधमो जनः १६॥ इस आवागमनरूपी संसारचक्रसे बुद्धिमानोंको पार जाना उचित है. हे राजन् ! जो प्राणी अधम है, वह इन्द्रियोंकी क्रीडासे सुख मानते हैं ॥ १६ ॥
(३०) गणेशगीता-अ० २. अन्तरात्मनि यः प्रीत आत्मारामोऽखिलप्रियः॥ आत्मतृप्तो नरो यः स्यात्तस्यार्थो नैव विद्यते १७ जो अन्तरात्मामें प्रीति करनेवाले हैं, वही आत्माराम और सबके प्यारे हैं, जो प्राणी आत्मतृप्त हैं उन्हें किसी बातकी इच्छा नहीं रहती ॥ १७ ॥ कार्याकार्यकृतीनां स नैवाप्नोति शुभाशुभे ॥ किंचिदस्य न साध्यं स्यात्सर्वजंतुषु सर्वदा १८॥ इस प्रकारके प्राणी कार्याकार्य करके भी शुभ अशुभ फलको नहीं प्राप्त होते, यह कुछ करें अथवा न करें तोभी उनको कुछ प्रयोजन नहीं, सम्पूर्ण प्राणियोंमें इनका कोई भी प्रयोजनाधार नहीं, ऐसे पुरुषोंको कुछ साध्य नहीं ॥१८॥ अतोऽसक्ततया भूप कर्त्तव्यं कर्म जंतुभिः ॥ सक्तोऽगतिमवाप्नोति मामवाप्नोति तादृशः॥१९॥ इस कारण हे राजन् ! आसक्ति रहित होकर प्राणियोंको कर्म करना उचित है, जो आसक्त होताहै उसकी दुर्गति होती है, और अनासक्त मुझे प्राप्त हो जाताहै ॥ १९ ॥ परमां सिद्धिमापन्नाः पुरा राजर्षयो द्विजाः ॥ संग्रहाय हि लोकानां तादृशं कर्म चारभेत् २०॥
भाषाटीकासमेत । ( ३१ ) हे राजन् ! कर्म करनेसे बहुतसे राजर्षि परमसिद्धिको प्राप्त हुए हैं. लोक संग्रहके निमित्तही अनासक्त होकर कर्म करने उचित हैं ॥ २० ॥ श्रेयान्यत्कुरुते कर्म तत्करोत्यखिलो जनः ॥ मनुते यत्प्रमाणं स तदेवानुसरत्यसौ ॥२१॥ जो कर्म महत् पुरुष करते हैं, वही कर्म और सब करते हैं वह जिसका प्रमाण करते हैं, दूसरे भी उसीको मानते हैं ॥२१॥ विष्टपे मे न साध्योऽस्ति कश्चिदर्थो नराधिप ॥ अनालब्धश्च लब्धव्यःकुर्वे कर्म तथाप्यहम् २२॥ हे राजन् ! मुझे कोई वस्तु स्वर्गादिमें दुर्लभ नहीं है, और मैं कर्म करके किसी अलभ्य वस्तुको प्राप्त होनेकी भी इच्छा नहीं करताहूं ॥ २२ ॥ न कुर्वेऽहं यदा कर्म स्वतन्त्रोऽलसभाविताः ॥ करिष्यन्ति मम ध्यानं सर्वे वर्णा महामते॥२३॥ और जो मैं आलसी और स्वतंत्र होकर कर्म न करूं तो सबही वर्ण कर्म छोडकर केवल मेरा ध्यानहीं करें ॥ २३ ॥ भविष्यन्ति ततो लोका उच्छिन्नाः संप्रदायिनः॥ हंता स्यामस्य लोकस्य विधाता शंकरस्यच २४॥
( ३२ ) गणेशगीता-अ० २. हे महामतिमान् राजा ! तब मेरे ऐसा करनेसे सब वर्ण आचार भ्रष्ट हो जायँगे, इससे इस वर्णसंकरका करने- वाला भी मैं ही हूंगा ॥ २४ ॥ कामिनो हि सदा कामैरज्ञानात्कर्मकारिणः ॥ लोकानां संग्रहायैतद्विद्वान् कुर्यादसक्तधीः॥२५॥ जिस प्रकारसे कामनावाले अज्ञानसे सदा कर्म करते रहते हैं, इसीप्रकार विद्वान्को उचित है कि लोकसंग्रहके निमित्त आसक्ति रहित होकर कर्म करता रहे ॥ २५ ॥ विभिन्नत्वमतिं जह्यादज्ञानां कर्मचारिणाम् ॥ योगयुक्तः सर्वकर्माण्यर्पयेन्मयि कर्मकृत् ॥२६॥ अज्ञानसे कर्म करनेवालोंकी भेदबुद्धिको त्याग करै, योगयुक्त होकर कर्म करताहुआ वे सब कर्म मुझे अर्पण करदे ॥ २६ ॥ अविद्यागुणसाचिव्यात्कुर्वन्कर्माण्यतन्द्रितः ॥ अहंकाराद्भिन्नबुद्धिरहंकर्तेति योऽब्रवीत् ॥२७॥ हे राजन् ! सबही कर्म प्रकृतिके सत्त्वादि गुणोंने किये हैं, तथापि अहंकारसे मूढ होकर पुरुष अपनेको कर्ता मानता है २७
भाषाटीकासमेत। ( ३३ ) यस्तु वेत्त्यात्मनस्तत्त्वं विभागाद्गुणकर्मणोः॥ करणं विषये वृत्तमिति मत्वा न सज्जते ॥ २८ ॥ जो कोई सत्वादि गुण तथा उनके कर्मोंके विभागको इस प्रकार जानते हैं, कि सत्वादि गुण आपअपने कार्योंमें वर्त्त- मान हैं, तौ वह कर्ममें लिप्त नहीं होते हैं ॥ २८ ॥ कुर्वन्ति सफलं कर्म गुणैस्त्रिभिर्विमोहिताः ॥ अविश्वस्तः स्वात्मद्रुहो विश्वविन्नैव लंघयेत् २९॥ सत, रज, तम इन तीन गुणोंसे मोहित हुए प्राणी फलकी इच्छासे कर्म करते हैं, उनका विश्वासी और आत्मद्रोहियोंको सर्वज्ञ पुरुष कर्ममार्गसे चलायमान न करे ॥ २९ ॥ नित्यं नैमित्तिकं तस्मान्मयि कर्मार्पयेद्बुधः ॥ त्यक्त्वाहंममताबुद्धिं परांगतिमवाप्नुयात्॥३०॥ इस कारण पण्डितको उचित है कि मुझहीमें नित्य नैमि- त्तिक कर्मको अर्पण करदे तो वह अहं और ममता बुद्धिको त्यागन करके परमगतिको प्राप्त हो जायगा ॥ ३० ॥ अनीर्ष्यान्तो भक्तिमन्तो ये मयोक्तमिदं शुभम्॥ अनुतिष्ठन्ति ये सर्वे मुक्तास्तेऽखिलकर्मभिः ३१ २
( ३४ ) गणेशगीता अ० २. ईर्षा न करनेवाले भक्तिमान् मनुष्य मेरे कहे हुए इस शुभ मार्गको जो अनुष्ठान करते हैं, वे सब कर्मोंसे मुक्त हो जाते हैं ३१ ये चैव नानुतिष्ठन्ति त्वशुभा हतचेतसः ॥ ईर्ष्यमाणान्महामूढान्नष्टांस्तान्विद्धि मे रिपूनू ३२ और जो अज्ञानसे चित्त नष्ट होनेके कारण इसका अनुष्ठान नहीं करते हैं, उन मूर्ख नष्ट अपवित्र और नष्ट बुद्धियोंको मेरा शत्रु जानो ॥ ३२ ॥ तुल्यं प्रकृत्या कुरुते कर्म यज्ज्ञानवानपि ॥ अनुयाति च तामेवाग्रहस्तत्र मुधा मतः ॥३३॥ जब ज्ञानवान् भी अपने स्वभावके अनुसार चेष्टा करता है तौ अज्ञानीकी बातही क्या है, इस कारण सब जीव जब अपनी अपनी प्रकृतिको प्राप्त हैं, तौ निग्रह कैसे करै ॥ ३३ ॥ कामश्चैव तथा क्रोधः खानामर्थेषु जायते ॥ नैतयोर्वश्यतां यायादस्य विध्वंसकौ यतः॥३४॥ कर्मेंद्रिय और ज्ञानेन्द्रियके निमित्त काम और क्रोध यह दोही स्थित हैं, इनके वशमें न होना चाहिये, कारण कि, यही प्राणीके शत्रुरूप हैं ॥ ३४ ॥
भाषाटीकासमेत । (३५) शस्तोऽगुणो निजो धर्मः साङ्गादन्यस्य धर्मतः ॥ निजे तस्मि मृतिः श्रेयोऽपरत्र भयदः परः ३५॥ अपना धर्म यदि निर्गुण हो तौ भी अच्छा है, और धर्म गुणयुक्त होनेसे भी भला नहीं, अपने धर्ममें मरना भला है, परन्तु परलोकमें भय देनेहारा दूसरेका धर्म श्रेष्ठ नहीं ॥ ३५ ॥ वरेण्य उवाच । पुमान्यत्कुरुते पापं स हि केन नियुज्यते ॥ अकांक्षन्नपि हेरम्ब प्रेरितः प्रबलादिव ॥ ३६ ॥ वरेण्यने कहा हे गणेशजी ! यह जो प्राणी पाप करता है सो किसके द्वारा करता है, विषयोंका त्यागकर इच्छा नहीं करता हुआ भी जैसे कोई बलसे करावे. ऐसे प्रेरण किया हुआ पापाचरण करता है ॥ ३६ ॥ श्रीगजानन उवाच । कामक्रोधौ महापापौ गुणद्वयसमुद्भवौ ॥ नयंतौ वश्यतां लोकान् विद्ध्येतौ द्वेषिणौ वरौ ३७ श्रीगणेशजी बोले कि रजोगुण और तमोगुणसे उत्पन्न हुए यह दो काम और क्रोधही महापापी लोगोंको अपने वशमें करते हैं, इन्ही दोनोंको तुम महा शत्रु जानो ॥ ३७ ।
( ३६ ) गणेशगीता-अ० २. आवृणोति यथा माया जगद्भाष्पो जलं यथा ॥ वर्षामेघो यथाभानुं तद्वत्कामोऽखिलांश्च रुट् ३८ जिस प्रकारसे माया जगत्को ढकती है जैसे वाफ जलको आच्छादन करती है, वर्षा कालका मेघ जैसे सूर्यको ढकलेता है इसी प्रकार कामने सबको ढक लिया है ॥ ३८ ॥ प्रतिपत्तिमतो ज्ञानं छादितं सततं द्विषा ॥ इच्छात्मकेन तरसा दुष्पोषेण च शुष्मिणा ३९॥ वेगवान् पोषण करनेमें कठिन महाबली सदैव द्वेष करने- हारे इच्छात्मक कामनेही ज्ञानको ढक रक्खा है ॥ ३९ ॥ आश्रित्य बुद्धिमनसी इन्द्रियाणि स तिष्ठति ॥ तैरेवाच्छादितप्रज्ञो ज्ञानिनं मोहयत्यसौ ॥४०॥ यह काम बुद्धि और मन इन दो इन्द्रियोंके आश्रय होकर रहता है कामनाही इन्द्रियोंसे ज्ञानको आच्छादन करके देह- धारीको मोहित करती है ॥ ४० ॥ तस्मान्नियम्य तान्यादौ स मनांसि नरो जयेत् ॥ ज्ञानविज्ञानयोः शांतिकरं पापं मनोभवम् ४१॥ इसकारण मनके सहित इन्द्रियोंको वश करके ज्ञान और विज्ञानके नाशकरनेवाले पापात्माकामको जीतो ॥ ४१ ॥
भाषाटीकासमेत । ( ३७ ) यतस्तानि पराण्याहुस्तेभ्यश्च परं मनः ॥ ततोऽपिहि परा बुद्धिरात्मा बुद्धेः परो मतः॥४२॥ स्थूलसे इंद्रिय परे हैं, इन्द्रियोंसे परे मन है, मनसे परे बुद्धि है, और बुद्धिसे परे परमात्मा है ॥ ४२ ॥ बुद्ध्वैवमात्मनात्मानं संस्तभ्यात्मानमात्मना ॥ हत्वा शत्रुं कामरूपं परं पदमवाप्नुयात् ॥४३॥ ॐ तत्सादिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगा- मृतार्थशास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उत्तरखण्डे गजानन- वरेण्यसंवादे कर्मयोगोनामद्वितीयोऽध्यायः॥ २ ॥ इस प्रकार आत्मासे आत्माको जानकर आत्मासेही आत्माको अटल बनाकर कामरूपी शत्रुको मार परम पदको प्राप्त होता है ॥ ४३ ॥ ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृतार्थ- शास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उत्तरखण्डे गजाननवरेण्यसंवादे पंडितज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ शुभमस्तु ।
( ३८ ) गणेशगीता-अ० ३. श्रीगजानन उवाच । पुरा सर्गादिसमये त्रैगुण्यं त्रितनूरुहम् ॥ निर्माय चैनमवदं विष्णवे योगमुत्तमम् ॥ १ ॥ श्रीगणेशजी बोले प्रथम सृष्टि उत्पन्न करनेके समय तीन गुणोंसे युक्त तीन शरीरमें रहनेहारा उत्तम योगको निर्माण करके प्रथम विष्णुके निमित्त यह योग वर्णन किया था ॥१॥ अर्यम्णे सोऽब्रवीत्सोऽपि मनवे निजसूनवे ॥ ततः परंपरायातं विदुरेनं महर्षयः ॥ २ ॥ विष्णुने यही योग सूर्यसे कहा सूर्यने अपने पुत्र मनुसे कहा इसके उपरान्त परंपरासे प्राप्त हुए इस योगको महर्षि जानते रहे ॥ २ ॥ कालेन बहुना चायं नष्टः स्याच्चरमे युगे ॥ अश्रद्धेयो ह्यविश्वास्यो विगीतव्यश्च भूमिप ॥३॥ हे राजन् ! पिछले युगमें जब कि श्रद्धाहीन अविश्वासी और निन्दित जन हुए तब यह बहुत काल उपरान्त नष्ट हुआ था ३ एवं पुरातनं योगं श्रुतवानसि मन्मुखात् ॥ गुह्याद्गुह्यतरं वेदरहस्यं परमं शुभम् ॥ ४ ॥
भाषाटीकासमेत । ( ३९ ) यह अब फिर तुमने मेरे मुखसे पुरातन योगको सुना है यह गुप्तसे भी गुप्त अत्यन्त कल्याणकारक सम्पूर्ण वेदोंका सार है ॥ ४ ॥ वरेण्य उवाच । सांप्रतं चावतीर्णोऽसि गर्भतस्त्वं गजानन ॥ प्रोक्तवान्कथमेतं त्वं विष्णवे योगमुत्तमम् ॥५॥ वरेण्यराजा बोला हे गजानन ! इस समय आप गर्भसे तौ उत्पन्न हुएहो, फिर तुमने विष्णुसे यह योग किसप्रकारसे वर्णन किया ॥ ५ ॥ गणेश उवाच । अनेकानि च ते जन्मान्यतीतानि ममापि च ॥ संस्मरे तानि सर्वाणि न स्मृतिस्तव वर्तते ॥६॥ गणेशजी बोले हे राजन् ! मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म बीत चुके हैं, मैं उन्हें सबको जानता हूं, पर तुम नहीं जानते ॥६॥ मत्त एव महाबाहो जाता विष्ण्वादयः सुराः ॥ मय्येव च लयं यान्ति प्रलयेषु युगेयुगे ॥ ७ ॥ हे महाभुज ! मुझसेही विष्णुआदि देवता उत्पन्न हुए हैं, और युगयुगमें प्रलयके समय मुझमेंही लय होजाते हैं ॥ ७ ॥
(४०) गणेशगीता अ० ३. अहमेव परो ब्रह्मा महारुद्रोऽहमेव च ॥ अहमेव जगत्सर्वं स्थावरं जंगमं च यत् ॥ ८ ॥ मैं ही श्रेष्ठब्रह्मा हूं, मैंही महारुद्र हूं, मैं ही स्थावर जंगमरूप सम्पूर्ण जगत हूं ॥ ८ ॥ अजोऽव्ययोऽहंभूतात्माऽनादिरीश्वर एव च ॥ आस्थाय त्रिगुणां मायां भवामि बहुयोनिषु ९॥ यद्यपि मैं अजन्मा अविनाशी अनादि ईश्वरहूं परन्तु त्रिगु- णात्मक मायामें स्थित होकर अनेक अवतार धारण करताहूं ९ अधर्मोपचयो धर्मापचयो हि यदा भवेत् ॥ साधूनसंरक्षितुं दुष्टांस्ताडितुं सम्भवाम्यहम् १०॥ जिस समय अधर्मकी वृद्धि और धर्मकी हानि होती है, उस समय साधुओंकी रक्षा और दुष्टोंके मारनेको मैं अवतार लेता हूं ॥ १० ॥ उच्छिद्याधर्मनिचयं धर्मं संस्थापयामि च ॥ हन्मि दुष्टांश्च दैत्यांश्च नानालीलाकरो मुदा ११ अधर्मके समूहको नष्टकर धर्मका स्थापन करताहूं और अनेक प्रकारकी लीलाकर आनंदसे दुष्ट दैत्योंका वध करताहूं॥११॥
भाषाटीकासमेत । ( ४१ ) वर्णाश्रमान्मुनीन्साधून्पालये बहुरूपधृक् ॥ एवं यो वेत्ति संभूतिर्मम दिव्या युगेयुगे ॥१२॥ अनेक रूप धारण कर वर्ण आश्रम और साधुओंको पालन करताहूं, इस प्रकारसे जो युगयुगमें मेरी दिव्य विभू- तिको जानत है ॥ १२ ॥ तत्तत्कर्म च वीर्यं च मम रूपं समासतः ॥ त्यक्ताहंममताबुद्धिं न पुनर्भूः स जायते ॥१३॥ उन मेरे कर्म वीर्य और रूपका सेवन करता हुआ अहंकार और ममता बुद्धि त्याग न करै तो मुक्त होजाता है ॥ १३ ॥ निरीहा निर्भयारोषा मत्परा मद्यपाश्रयाः ॥ विज्ञानतपसा शुद्धा अनेके मामुपागताः ॥१४॥ इच्छारहित निर्भय क्रोधहीन मुझमेंही भाव और मेरीही उपासना करनेहारे विज्ञान और तपस्यासे शुद्ध होकर अनेक प्राणी मुझको प्राप्त होगये हैं ॥ १४ ॥ येन येन हि भावेन संसेवन्ते नरोत्तमाः ॥ तथातथा फलं तेभ्यःप्रयच्छाम्यव्ययःस्फुटम् १५ श्रेष्ठ जन मुझे जिस जिस भावसे सेवन करते हैं,मैं अविन- श्वर प्रत्यक्ष उनको वैसा वैसाही फल देताहूं ॥ १५ ॥ ६
( ४२ ) गणेशगीता अ० ३ । जनाः स्युरितरे राजन्मम मार्गानुयायिनः ॥ तथैव व्यवहारं ते स्वेषु चान्येषु कुर्वते ॥ १६ ॥ हे राजन् ! जिस प्रकारसे दूसरे लोग भी मेरे अनुयायी होजाँय, इसी प्रकारका व्यवहार वे अपने तथा दूसरे मनुष्योंमें करते हैं ॥ १६ ॥ कुर्वन्ति देवताप्रीतिं कांक्षन्तः कर्मणां फलम् ॥ प्राप्नुवन्तीह ते लोके शीघ्रं सिद्धिं हि कर्मजाम् १७ और जो कर्मोंके फल प्राप्त होनेकी इच्छासे देवताओंकी उपासना करते हैं, उन उन कर्मोंके अनुसार उनको शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है ॥ १७ ॥ चत्वारो हि मया वर्णा रजःसत्त्वतमोंऽशतः ॥ कर्मांशतश्च संसृष्टा मृत्युलोके मयाऽनघ ॥१८॥ हे पापरहित ! मृत्युलोकमें मैंने चारों वर्णोंको सत्त्व रज तम इन गुणोंसे और कर्मोंके अंशसे उत्पन्न किया है ॥१८ ॥ कर्त्तारमपि तेषां मामकर्त्तारं विदुर्बुधाः ॥ अनादिमीश्वरं नित्यमलिप्तं कर्मजैर्गुणैः ॥१९॥ यद्यपि मैं इनका कर्ता हूं परन्तु पंडित जन मुझे अकर्ता जानते हैं अनादि, ईश्वर, नित्य और कर्मोंके गुणोंसे अलिप्त मानते हैं ॥ १९ ॥
भाषाटीकासमेत । ( ४३ ) निरीहं योऽभिजानाति कर्म बध्नाति नैव तम् ॥ चक्रुः कर्माणि बुद्ध्वैवं पूर्वपूर्व मुमुक्षवः ॥२०॥ जो मुझे इच्छारहित जानता है उसको कर्मबंधन नहीं होता इस कारण पूर्वमें मुमुक्षु जन यह बिचारकर कर्म करते थे २० वासनासहितादाद्यात्संसारकारणाद्दृढात् ॥ अज्ञानबन्धनाज्जन्तुर्बुद्ध्वायं मुच्यतेऽखिलात् २१ वासनासे युक्त जो कि संसारका दृढ कारण है यही अज्ञा- नका बंधन है इसे जानकर प्राणी मुक्त होता है ॥ २१ ॥ तदकर्म च कर्मापि कथयाम्यधुना तव ॥ यत्र मौनं गता मोहादृषयो बुद्धिशालिनः ॥२२॥ क्या कर्म और क्या अकर्म है यह मैं तुमसे कहताहूं इसके जाननेमें ऋषिभी मोहको प्राप्त होजाते हैं ॥ २२ ॥ तत्त्वं मुमुक्षुणा ज्ञेयं कर्माकर्मविकर्मणाम् ॥ त्रिविधानीह कर्माणि सुनिम्नैषां गतिःप्रिय२३॥ कर्म अकर्म और विकर्म इसका तत्त्व मुक्तिकी इच्छा करनेवालोंको जानना अवश्य है, वेतीनही कर्म हैं हे प्रिय !
( ४४ ) गणेशगीता अ० ३. इनकी गति जाननी महाकठिन है, तू मेरा भक्त है इससे कहता हूं ॥ २३ ॥ क्रियायामक्रियाज्ञानमक्रियायां क्रियामतिः ॥ यस्यस्यात्सहिमत्येँस्मिँल्लोकेमुक्तोऽखिलार्थकृत्। क्रियामें अक्रियाका ज्ञान, और अक्रियामें क्रियाकी मति जिसकी होती है वही इस लोकमें सब कर्मका करनेवाला हो तौभी मुक्त होजाता है ☸ ॥ २४ ॥ कर्मांकुरवियोगेन यः कर्माण्यारभेन्नरः ॥ तत्त्वदर्शननिर्दग्धक्रियमाहुर्बुधा बुधम् ॥ २५ ॥ जो कर्मोंके अंकुरके वियोगसे अर्थात् संकल्प और कामना रहित कर्म करते हैं तत्त्वके जाननेसे उनकी सब क्रिया दग्ध हैं, ऐसा पंडितजन कहते हैं ॥ २५ ॥
- अर्थात् देह और इंद्रिय आदिके जितने उचित और निषिद्ध कर्म हैं उनमेंसे किसकोभी आत्मा नहीं करता है और सब बाह्य कर्म त्यागने परभी यदि देहादिको आत्मा मानाजाय तौभी अन्तर शारीरिक क्रियां होती है वहभी आत्माकी क्रिया समझी जाती है एवं उनसे आत्माको संसारका दुःख आवरण करलेता है, इस प्रकारका जिन्हें विश्वास है वही जनोंमें बुद्धिमान् हैं और सब कर्म करते रहनेपरभी योगी हैं॥