गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३६ ) गणेशगीता-अ० २. आवृणोति यथा माया जगद्भाष्पो जलं यथा ॥ वर्षामेघो यथाभानुं तद्वत्कामोऽखिलांश्च रुट् ३८ जिस प्रकारसे माया जगत्को ढकती है जैसे वाफ जलको आच्छादन करती है, वर्षा कालका मेघ जैसे सूर्यको ढकलेता है इसी प्रकार कामने सबको ढक लिया है ॥ ३८ ॥ प्रतिपत्तिमतो ज्ञानं छादितं सततं द्विषा ॥ इच्छात्मकेन तरसा दुष्पोषेण च शुष्मिणा ३९॥ वेगवान् पोषण करनेमें कठिन महाबली सदैव द्वेष करने- हारे इच्छात्मक कामनेही ज्ञानको ढक रक्खा है ॥ ३९ ॥ आश्रित्य बुद्धिमनसी इन्द्रियाणि स तिष्ठति ॥ तैरेवाच्छादितप्रज्ञो ज्ञानिनं मोहयत्यसौ ॥४०॥ यह काम बुद्धि और मन इन दो इन्द्रियोंके आश्रय होकर रहता है कामनाही इन्द्रियोंसे ज्ञानको आच्छादन करके देह- धारीको मोहित करती है ॥ ४० ॥ तस्मान्नियम्य तान्यादौ स मनांसि नरो जयेत् ॥ ज्ञानविज्ञानयोः शांतिकरं पापं मनोभवम् ४१॥ इसकारण मनके सहित इन्द्रियोंको वश करके ज्ञान और विज्ञानके नाशकरनेवाले पापात्माकामको जीतो ॥ ४१ ॥