भारतकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 130 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 36

भाषाटीकासमेत । (३५) शस्तोऽगुणो निजो धर्मः साङ्गादन्यस्य धर्मतः ॥ निजे तस्मि मृतिः श्रेयोऽपरत्र भयदः परः ३५॥ अपना धर्म यदि निर्गुण हो तौ भी अच्छा है, और धर्म गुणयुक्त होनेसे भी भला नहीं, अपने धर्ममें मरना भला है, परन्तु परलोकमें भय देनेहारा दूसरेका धर्म श्रेष्ठ नहीं ॥ ३५ ॥ वरेण्य उवाच । पुमान्यत्कुरुते पापं स हि केन नियुज्यते ॥ अकांक्षन्नपि हेरम्ब प्रेरितः प्रबलादिव ॥ ३६ ॥ वरेण्यने कहा हे गणेशजी ! यह जो प्राणी पाप करता है सो किसके द्वारा करता है, विषयोंका त्यागकर इच्छा नहीं करता हुआ भी जैसे कोई बलसे करावे. ऐसे प्रेरण किया हुआ पापाचरण करता है ॥ ३६ ॥ श्रीगजानन उवाच । कामक्रोधौ महापापौ गुणद्वयसमुद्भवौ ॥ नयंतौ वश्यतां लोकान् विद्ध्येतौ द्वेषिणौ वरौ ३७ श्रीगणेशजी बोले कि रजोगुण और तमोगुणसे उत्पन्न हुए यह दो काम और क्रोधही महापापी लोगोंको अपने वशमें करते हैं, इन्ही दोनोंको तुम महा शत्रु जानो ॥ ३७ ।