भारतकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

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( ३४ ) गणेशगीता अ० २. ईर्षा न करनेवाले भक्तिमान् मनुष्य मेरे कहे हुए इस शुभ मार्गको जो अनुष्ठान करते हैं, वे सब कर्मोंसे मुक्त हो जाते हैं ३१ ये चैव नानुतिष्ठन्ति त्वशुभा हतचेतसः ॥ ईर्ष्यमाणान्महामूढान्नष्टांस्तान्विद्धि मे रिपूनू ३२ और जो अज्ञानसे चित्त नष्ट होनेके कारण इसका अनुष्ठान नहीं करते हैं, उन मूर्ख नष्ट अपवित्र और नष्ट बुद्धियोंको मेरा शत्रु जानो ॥ ३२ ॥ तुल्यं प्रकृत्या कुरुते कर्म यज्ज्ञानवानपि ॥ अनुयाति च तामेवाग्रहस्तत्र मुधा मतः ॥३३॥ जब ज्ञानवान् भी अपने स्वभावके अनुसार चेष्टा करता है तौ अज्ञानीकी बातही क्या है, इस कारण सब जीव जब अपनी अपनी प्रकृतिको प्राप्त हैं, तौ निग्रह कैसे करै ॥ ३३ ॥ कामश्चैव तथा क्रोधः खानामर्थेषु जायते ॥ नैतयोर्वश्यतां यायादस्य विध्वंसकौ यतः॥३४॥ कर्मेंद्रिय और ज्ञानेन्द्रियके निमित्त काम और क्रोध यह दोही स्थित हैं, इनके वशमें न होना चाहिये, कारण कि, यही प्राणीके शत्रुरूप हैं ॥ ३४ ॥

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