गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत। ( ३३ ) यस्तु वेत्त्यात्मनस्तत्त्वं विभागाद्गुणकर्मणोः॥ करणं विषये वृत्तमिति मत्वा न सज्जते ॥ २८ ॥ जो कोई सत्वादि गुण तथा उनके कर्मोंके विभागको इस प्रकार जानते हैं, कि सत्वादि गुण आपअपने कार्योंमें वर्त्त- मान हैं, तौ वह कर्ममें लिप्त नहीं होते हैं ॥ २८ ॥ कुर्वन्ति सफलं कर्म गुणैस्त्रिभिर्विमोहिताः ॥ अविश्वस्तः स्वात्मद्रुहो विश्वविन्नैव लंघयेत् २९॥ सत, रज, तम इन तीन गुणोंसे मोहित हुए प्राणी फलकी इच्छासे कर्म करते हैं, उनका विश्वासी और आत्मद्रोहियोंको सर्वज्ञ पुरुष कर्ममार्गसे चलायमान न करे ॥ २९ ॥ नित्यं नैमित्तिकं तस्मान्मयि कर्मार्पयेद्बुधः ॥ त्यक्त्वाहंममताबुद्धिं परांगतिमवाप्नुयात्॥३०॥ इस कारण पण्डितको उचित है कि मुझहीमें नित्य नैमि- त्तिक कर्मको अर्पण करदे तो वह अहं और ममता बुद्धिको त्यागन करके परमगतिको प्राप्त हो जायगा ॥ ३० ॥ अनीर्ष्यान्तो भक्तिमन्तो ये मयोक्तमिदं शुभम्॥ अनुतिष्ठन्ति ये सर्वे मुक्तास्तेऽखिलकर्मभिः ३१ २