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गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

॥ श्रीः ॥ श्रीगणेशाय नमः । गणेशगीता भाषाटीका सहित दोहा-विघ्नहरण मंगलकरण, शरण सुखददातार ॥ श्रीगणेश पदकमलयुग, वन्दौं वारंवार ॥ १ ॥ श्लोक-ब्रह्माणमथ विष्णुं च शिवं गणपतिं तथा ॥ अम्बिकां शारदां चापि वन्दे विघ्नोपशांतये ॥१॥ शुक उवाच । एवमेव पुरा पृष्टः शौनकेन महात्मना ॥ स सूतः कथयामास गीतां व्यासमुखाच्छ्रुताम् १

( ६ ) गणेशगीता-अ० १. इसीप्रकारसे पूर्वकालमें महात्मा शौनकके पूछनेपर सूत- जीने व्यासजीके मुखसे श्रवण कीहुई गीताको वर्णन कियाथा १ सूत उवाच । अष्टादशपुराणोक्तममृतं प्राशितं त्वया ॥ ततोऽतिरसवत्पातुमिच्छाम्यमृतमुत्तमम् ॥२॥ सूतजी बोले हे भगवन् ! वेदव्यासजी आपने अष्टादश पुरा- णका साररूप अमृत मुझे पान कराया, परन्तु अब उससेभी अधिक रसीले उत्तम अमृतपान करनेकी मुझे इच्छा है ॥२॥ येनामृतमयो भूत्वा पुमान्ब्रह्मामृतं यतः ॥ योगामृतं महाभाग तन्मे करुणया वद ॥३॥ जिस अमृतको पानकर योगी ब्रह्मरूपको प्राप्त होजाते हैं हे महाभाग ! वह कृपाकर आप मुझसे वर्णन कीजिये ॥ ३ ॥ व्यास उवाच । अथ गीतां प्रवक्ष्यामि योगमार्गप्रकाशिनीम्॥ नियुक्ता पृच्छते सूत राज्ञे गजमुखेन या ॥४॥ व्यासजी बोले हे सूतजी ! योग मार्गकी प्रकाश करने- वाली गीताका तुमसे वर्णन करताहूं कि जिसको वरेण्य

भाषाटीकासमेत । (७) राजाके पूछनेपर सम्पूर्ण विघ्नोंके नाशक गणेशजीने कहाथा ॥ ४ ॥ वरेण्य उवाच । विघ्नेश्वर महाबाहो सर्वविद्याविशारद ॥ सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञ योगं मे वक्तुमर्हसि ॥५॥ वरेण्य राजा बोला कि हे विघ्न दूर करने हारे ! हे महा- भुज ! हे सर्व विद्याओंके पंडित ! हे संपूर्ण शास्त्रके तत्त्वको जानने वाले, आप मुझसे योगमार्गका वर्णन कीजिये ॥ ५ ॥ श्रीगजानन उवाच ॥ सम्यग्व्यवसिता राजन्मतिस्तेऽनुग्रहान्मम ॥ शृणु गीतां प्रवक्ष्यामि योगामृतमयीं नृप ॥६॥ श्रीभगवान् बोले. राजन्! मेरी कृपासे तुम्हारी बुद्धि निर्मल और शास्त्रको ग्रहण करनेवाली है, सुनो मैं योगाऽमृत गीता तुमसे कहताहूं ॥ ६ ॥ न योगं योगमित्याहुर्योगो योगो न च श्रियः॥ न योगो विषयैर्योगो न च मात्रादिभिस्तथा॥७॥ ‘योग” इस शब्दकाही नाम योग नहीं, लक्ष्मीकी प्राप्ति होनेका नाम योग नहीं, विषय सुखकी प्राप्ति होनेका

( ८ ) गणेशगीता-अ० १. नाम योग नहीं, इंद्रिय सम्पन्न होनेका नाम योग नहीं है ॥ ७ ॥ योगो यः पितृमात्रादेर्न स योगो नराधिप ॥ यो योगो बन्धुपुत्रादेर्यश्चाष्टभूतिभिः सह ॥८॥ हे राजन् ! माता पिताके समागमका नाम योग नही, आठ प्रकारकी सिद्धि और बंधुपुत्रादिकी प्राप्तिका नामभी योग नहीं है ॥ ८ ॥ न स योगः स्त्रिया योगो जगदद्भुतरूपया ॥ राज्ययोगश्च नो योगो न योगो गजवाजिभिः९॥ अत्यन्त रूपवती स्त्रीकी प्राप्तिका नाम योग नहीं है, राज्यकी प्राप्ति तथा हाथी घोडेकी प्राप्तिका नाम योग नहीं है ॥ ९ ॥ योगो नेन्द्रपदस्यापि योगो योगार्थिनः प्रियः॥ योगो यःसत्यलोकस्य न स योगो मतो मम १० . इन्द्रपदकी प्राप्तिका नाम योग नहीं है, योगद्वारा प्रिय सिद्धिकी इच्छा करनेका नाम योग नहीं है, सत्यलोककी प्राप्तिकोभी मैं योग नहीं मानता ॥ १० ॥

भाषाटीकासमेत। ( ९ ) शैवस्य योगो नो योगो वैष्णवस्य पदस्य यः ॥ न योगो भूप सूर्य्यत्वं चन्द्रत्वंन कुबेरता ॥११॥ शिवपदकी प्राप्तिहोनी, वैष्णवपदकी प्राप्तिहोनी उसका भी नाम योग नहीं, हे राजन् ! सूर्य चंद्र और कुबेरके पदकी प्राप्ति होनेकाभी नाम योग नहीं ॥ ११ ॥ नानिलत्वं नानलत्वं नामरत्वं न कालता ॥ न वारुण्यं न नैर्ऋत्यं योगो न सार्वभौमता ॥१२॥ वायुस्वरूप, अग्निस্বরূপ, देवस्वरूप, कालस्वरूप, वरुणस्व- रूप, निर्ऋतिस्वरूप, सम्पूर्ण पृथ्‍वीके राजपानेका नाम भी योग नहीं है ॥ १२ ॥ योगं नानाविधं भूप युञ्जन्ति ज्ञानिनस्ततम् ॥ भवंति वितृषा लोके जिताहारा विरेतसः ॥१३॥ हे राजन् ! योग अनेक प्रकारका है, परन्तु योग वही है, जिसको प्राप्त होकर ज्ञानी लोग संसारसे विरक्त होते हैं तथा आहार जीतकर इच्छा रहित होते हैं ॥ १३ ॥ पावयन्त्यखिलांल्लोकान्वशीकृतजगत्त्रयाः ॥ करुणापूर्णहृदया बोधयन्त्यपि कांश्चन ॥१४॥

(१०) गणेशगीता-अ १. ज्ञानीलोग तीनों जगत्को अपने वशमें करके सम्पूर्ण जगत्को पवित्र करते हैं, उनका हृदय दयासे पूर्ण होता है, वह किसीको बोधभी करते हैं ॥ १४ ॥ जीवन्मुक्ता ह्रदे मग्नाः परमानन्दरूपिणी ॥ निमील्याक्षीणि पश्यंतः परं ब्रह्म हृदिस्थितम् १५ वह जीवन्मुक्त होकर परमानन्दरूपी पदमें मग्न होते हैं, और नेत्रमूंदकर हृदयमें स्थित परब्रह्मका दर्शन करते हैं॥१५॥ ध्यायन्तः परमं ब्रह्म चित्ते योगवशीकृतम् ॥ भूतानि स्वात्मना तुल्यं सर्वाणि गणयन्ति ते १६ योगसे वशीभूत किये चित्तमें परब्रह्मका ध्यान करते हैं, सम्पूर्ण प्राणियोंको ज्ञानी अपनी तुल्य जानते हैं ॥ १६ ॥ येन केनचिदाच्छिन्ना येनकेनचिदाहताः ॥ येन केन चिदाकृष्टा येन केनचिदाश्रिताः ॥ १७॥ कहीं किसी कारणसे आच्छन्न कहीं किसीसे ताडित, कहीं किसीसे आकर्षित, कहीं किसीसे आश्रित ॥ १७ ॥ करुणापूर्णहृदया भ्रमन्ति धरणीतले ॥ अनुग्रहाय लोकानां जितक्रोधा जितेंद्रियाः।१८॥

भाषाटीकासमेत । ( ११ ) दयापूर्ण हृदय होकर पृथ्वीमें भ्रमण करते हैं, क्रोधको जीते जितेन्द्रिय हुए, लोकोंपर अनुग्रह करनेको विचरते हैं १८ देहमात्रभृतो भूप समलोष्टाश्मकाञ्चनाः ॥ एतादृशा महाभाग्याःस्युश्चक्षुर्गोचराःप्रिय॥१९॥ हे राजन् ! वे केवल देहमात्रकोही धारण करनेहारे, मिट्टी, पत्थर सुवर्णमें समान दृष्टि करनेवाले, इस प्रकारके महाभाग पुरुष जिस योगके द्वारा दृष्टिगोचर होजाते हैं ॥ १९ ॥ तमिदानीमहं वक्ष्ये शृणु योगमनुत्तमम् ॥ श्रुत्वा यं मुच्यते जन्तुःपापेभ्यो भवसागरात् २० उस श्रेष्ठ योगको मैं तुमसे इस समय कहता हूं जिसके श्रवण करनेसे यह प्राणी पापोंसे और भवसागरसे पार हो जाता है ॥ २० ॥ शिवे विष्णौ च शक्तौ च सूर्ये मयि नराधिप॥ याऽभेदबुद्धिर्योगःस सम्यग्योगो मतो मम २१॥ हे राजन् ! शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य और मुझमें जो ,अभेद बुद्धि करनी है उसीका नाम मैं यथार्थ योग मानताहूं ॥२१॥ अहमेव जगद्यस्मात्सृजामि पालयामि च ॥ कृत्वा नानाविधं वेषं संहरामि स्वलीलया २२॥

१. अध्याय १-३: राजा वरेण्य-गजानन संवाद, सांख्य-योग व कर्म-योग

( १२ ) गणेशगीता-अ० १. मैंही इस जगत्की उत्पत्ति पालन और संहार अपनी लीलासेही अनेक वेषधारणपूर्वक करताहूं ॥ २२ ॥ अहमेव महाविष्णुरहमेव सदाशिवः ॥ अहमेव महाशक्तिरहमेवार्यमा प्रिय ॥ २३ ॥ मैंही महाविष्णु, मैंही सदाशिव, मैंही महाशक्ति और मैंही सूर्य और यम हूं ॥ २३ ॥ अहमेको नृणां नाथो जातः पञ्चविधः पुरा ॥ अज्ञानान्मां न जानन्ति जगत्कारणकारणम् २४ मैंही एक मनुष्योंका स्वामी, इन पांच प्रकारसे पूर्वकालमें उत्पन्न हुआहूं, मैं जगत्की कारण मायाका भी कारणहूं मुझको अज्ञानी लोग नहीं जानते ॥ २४ ॥ मत्तोऽग्निरापो धरणी मत्त आकाशमारुतौ ॥ ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च लोकपाला दिशो दश२५॥ मुझहीसे अग्नि जल आकाश धरणी पवन ब्रह्मा विष्णु रुद्र लोकपाल दशों दिशा उत्पन्न हुई हैं ॥ २५ ॥ वसवो मुनयो गावो मनवः पशवोऽपि च ॥ सरितः सागरा यक्षा वृक्षाः पक्षिगणा अपि२६॥

भाषाटीकासमेत । ( १३ ) इसी प्रकार आठ वसु, मुनि, गौ, मनु, पशु, नदी, समुद्र, यज्ञ, वृक्ष, पक्षियोंके समूह ॥ २६ ॥ तथैकविंशतिः स्वर्गा नागाः सप्त वनानि च ॥ मनुष्याःपर्वताःसाध्याःसिद्धा रक्षोगणास्तथा २७ इक्कीस स्वर्ग, सात नाग, वन मनुष्य पर्वत साध्य सिद्ध राक्षस इत्यादिक सब मुझसे हुए हैं ॥ २७ ॥ अहं साक्षी जगच्चक्षुरलिप्तः सर्वकर्मभिः ॥ अविकारोऽप्रमेयोऽहमव्यक्तो विश्वगोऽव्ययः २८ मैंही सबका साक्षी हूं तथा सब जगत्का नेत्र, सब कर्मोंसे अलिप्तहूं निर्विकार, अप्रमेय अर्थात् प्रमाणों द्वाराभी जाननेमें नहीं आता, अव्यक्त, सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त और अविनाशी हूं ॥ २८ ॥ अहमेव परं ब्रह्माव्ययानन्दात्मकं नृप ॥ मोहयत्यखिलान्माया श्रेष्ठान्मम नरानमूनू॥२९ हे राजन् ! मैंही परब्रह्म अव्यय आनन्दस्वरूप हूं मेरी माया सम्पूर्ण जगत्‌को तथा श्रेष्ठ पुरुषोंकोभी मोहित करती है ॥२९॥ सर्वदा षड्विकारेषु तानियं योजयेद्भृशम् ॥ हित्वाजापटलं जन्तुरनेकैर्जन्मभिः शनैः ॥३०॥

( १४ ) गणेशगीता-अ० १. जो माया सदा कामक्रोधादि छः विकारोंमें इन प्राणियोंको लगादेती है, योगसे जब शनैः शनैः अनेक जन्मके मायाके कपाट दूर हो जाते हैं ॥ ३० ॥ विरज्य विन्दति ब्रह्म विषयेषु सुबोधतः ॥ अच्छेद्यं शस्त्रसंघातैरदाह्यमनलेन च ॥ ३१ ॥ तब यह प्राणी विषयोंसे जागकर और उनसे विरक्तहो पर- ब्रह्मको जानते हैं, जो ब्रह्म शस्त्र समूहोंसे छेदन नहीं होसक्ता अग्निसे दग्ध नहीं होसक्ता ॥ ३१ ॥ अक्लेद्यं भूप भुवनैरशोष्यं मारुतेन च ॥ अवध्यं वध्यमानेऽपि शरीरेऽस्मिन्नराधिप ।३२। जलसे गल नहीं सक्ता पवनसे सूख नहीं सकता, हे राजन् ! जो इस शरीरके नष्ट होनेपर भी नष्ट नहीं होता वही ब्रह्म है ॥ ३२ ॥ यामिमां पुष्पितां वाचं प्रशंसन्ति श्रुतीरिताम्॥ त्रयीवादरता मूढास्ततोऽन्यन्मन्वतेऽपि न ३३॥ वेदत्रयीमें प्रीति करनेहारे केवल कर्म करनेहारे मूढलोग श्रुतिकी कही हुई फल प्रतिपादक वाणीकीही प्रशंसा करते हैं दूसरी बातको नहीं मानने हैं ॥ ३३ ॥

भाषाटीकासमेत । ( १५ ) कुर्व्वन्ति सततं कर्म जन्ममृत्युफलप्रदम् ॥ स्वर्गैश्वर्यरता ध्वस्तचेतना भोगवृद्धयः ॥३४॥ इसी कारण वे जन्म और मृत्युके फल देनेहारे कर्मोंको सदा करते रहते हैं वे स्वर्गके ऐश्वर्योंमेंही लगे रहते हैं, उन भोगबुद्धिवालोंकी चेतना नष्ट होजाती है ॥ ३४ ॥ सम्पादयन्ति ते भूप स्वात्मना निजबन्धनम् ॥ संसारचक्रं युञ्जन्ति जडाः कर्मपरा नराः॥३५॥ हे राजन् ! वे आपही अपने निमित्त बंधन बनाते हैं, मूढ और कर्मपरायण मनुष्य संसारचक्रमें पडते हैं ॥ ३५ ॥ यस्य यद्विहितं कर्म तत्कर्तव्यं मदर्पणम् ॥ ततोऽस्य कर्मबीजानामुच्छिन्नाः स्युर्महांकुराः ३६ जिसको जो कर्म विधान किया है, वह मेरे अर्पण करना चाहिये, तब इन प्राणियोंके कर्मरूप बीजोंके महा अंकुर नष्ट हों ॥ ३६ ॥ चित्तशुद्धिश्च महती विज्ञानसाधिका भवेत् ॥ विज्ञानेन हि विज्ञातं परं ब्रह्म मुनीश्वरैः ॥३७॥ चित्तकी शुद्धि होनेसेही विज्ञानकी प्राप्ति होती है, विज्ञानके द्वाराही ऋषियोंने परब्रह्मको जाना है ॥ ३७ ॥

( १६ ) गणेशगीता-अ १. तस्मात्कर्माणि कुर्वीत बुद्धियुक्तो नराधिप ॥ न त्वकर्मा भवेत्कोऽपि स्वधर्मत्यागवांस्तथा ३८ हे राजन् ! इसकारण जो कर्मकरे वह बुद्धियुक्त है अर्थात् मेरे अर्पण करे, कारण कि जिस कर्मका त्याग होनेसे स्वध- र्मका त्याग होता है वह त्याग उचित नहीं है ॥ ३८ ॥ जहाति यदि कर्माणि ततः सिद्धिं न विंदति ॥ आदौ ज्ञानेनाधिकारः कर्मण्येव स युज्यते३९॥ जो कर्मका त्याग करेगा तौ चित्तशुद्धि नहीं होगी, चित्त- शुद्धि न होनेसे ज्ञानकी प्राप्ति नहीं होगी, और सिद्धिकीभी प्राप्ति नहीं होगी, विना चित्तशुद्धिके ज्ञानमें अधिकार नहीं है, इसकारण प्रथम आसक्तिरहित होकर कर्म करना उचित है ३९॥ कर्मणा शुद्धहृदयोऽभेदबुद्धिमुपैष्यति ॥ स च योगः समाख्यातोऽमृतत्वाय हि कल्पते४० कर्मसे शुद्ध हृदय होकर अभेद बुद्धिको प्राप्त होता है, उसीका नाम योग है, जिससे प्राणी अमर होजाता है ॥ ४० ॥ योगमन्यं प्रवक्ष्यामि शृणु भूप तदुत्तमम् ॥ पशौ पुत्रे तथा मित्रे शत्रौ बन्धौ सुहृज्जने॥४१॥

भाषाटीकासमेत । ( १७ ) हे राजन् ! मैं और भी उत्तम योग कहताहूं,तुम उसे सुनो, पशु, मित्र, पुत्र, शत्रु, बंधु तथा सज्जन पुरुष ॥ ४१ ॥ बहिर्दृष्ट्या च समया हृत्स्थयालोकयेत्पुमान् ॥ सुखे दुःखे तथाऽमर्षे हर्षे भीतौ समो भवेत्॥४२॥ इन सबमें समान दृष्टि करनी चाहिये, बाहर भीतर एकसी दृष्टि रखनी, सुख, दुःख, क्रोध, हर्ष, भय इनमें समान रहना चाहिये ॥ ४२ ॥ रोगाप्तौ चैव भोगाप्तौ वा जये विजयेऽपि च ॥ श्रियोऽयोगे च योगे च लाभालाभेमृतावपि॥४३॥ रोगकी प्राप्ति हो, चाहे भोगकी प्राप्तिहो, जयहो, विजयहो लक्ष्मीकी प्राप्ति, अप्राप्ति, हानि, लाभ, जन्म, मरण, इन सबमें मनको समान रखना उचित है ॥ ४३ ॥ समो मां वस्तुजातेषु पश्यन्नन्तर्बहिः स्थितम् ॥ सूर्ये सोमे जले वह्नौ शिवे शक्तौ तथानिलेज४४ सम्पूर्ण वस्तुओंमें समान भावसे बाहर भीतर मुझे स्थित जानना, सूर्य, चन्द्रमा, जल, अग्नि, शिव, शक्ति, वायु॥४४॥ द्विजे हृदे महानद्यां तीर्थे क्षेत्रेऽघनाशिनि ॥ विष्णौ च सर्वदेवेषु तथा यक्षोरगेषु च ॥४५॥

( १८ ) गणेशगीता-अ० १. ब्राह्मण, छोटे सरोवर,महानदी,तीर्थ पापहारी क्षेत्र, विष्णु, सम्पूर्ण देवता, यक्ष, उरग ॥ ४५ ॥ गन्धर्वेषु मनुष्येषु तथा तिर्यग्भवेषु च ॥ सततं मां हि यः पश्येत्सोऽयं योगविदुच्यते ४६ गन्धर्व, मनुष्य, तिरछे चलनेहारे जीव, इन सबमें जो मुझे सदा समान दृष्टिसे देखता है वही योगका जाननेहारा कहाता है ॥ ४६ ॥ संप्राहृत्य स्वार्थेभ्य इन्द्रियाणि विवेकतः ॥ सर्वत्र समताबुद्धिः स योगो भूप मे मतः ॥४७॥ हे राजन् ! जो ज्ञानद्वारा इन्द्रियोंको स्वार्थसे हटाकर सर्वत्र समान बुद्धि रखता है, वही योग मानागया है ॥ ४७॥ आत्मानात्मविवेकेन या बुद्धिर्दैवयोगतः ॥ स्वधर्मासक्तचित्तस्य तद्योगो योग उच्यते॥४८॥ अपने धर्ममें आसक्त चित्त प्राणीकी दैवयोगसे जो आत्मा और अनात्माके विचारकी बुद्धि उत्पन्न होती है, उस बुद्धिके योगकाही नाम योग है ॥ ४८ ॥ धर्माधर्मौ जहातीह तया त्यक्त उभावपि ॥ अतो योगाय युञ्जीत योगो वैधेषु कौशलम्४९

भाषाटीकासमेत । ( १९ ) और उसी बुद्धिके न होनेसे यह प्राणी धर्म अधर्मका त्याग करता है, इसकारण योगमें बुद्धि लगानी उचित है, निष्काम कर्ममें कुशलता ही योग है ॥ ४९ ॥ धर्माधर्मफले त्यक्त्वा मनीषी विजितेन्द्रियः ॥ जन्मबन्धविनिर्मुक्तः स्थानं संयात्यनामयम् ५० जितेन्द्रिय बुद्धिमान् धर्म और अधर्मके फलको त्यागन करके जन्म बन्धनसे मुक्त होकर अनामय ( ब्रह्मलोक ) को प्राप्त होता है ॥ ५० ॥ यदा ह्यज्ञानकालुष्यं जन्तोर्बुद्धिः क्रमिष्यति ॥ तदासौ याति वैराग्यं वेदवाक्यादिषु क्रमात् ५१ जब इस प्राणीकी बुद्धि मोहरूपी अविद्यासे रहित होगी तब क्रमसे इस प्राणीका श्रवणयोग्य वेदवाक्यादिकोंमें जो फल प्रतिपादन करते हैं उनमें क्रमसे वैराग्य होगा ॥ ५१ ॥ त्रयीविप्रतिपन्नस्य स्थाणुत्वं यास्यते यदा ॥ परात्मन्यचला बुद्धिस्तदासौ योगमाप्नुयात् ५२ जब तीनों वेदोंमें प्रतिपादन किये कर्मसे यह बुद्धि परमा- त्मामें लगकर निश्चल होजाय तब इस प्राणीको योगकी प्राप्ति होती है ॥ ५२ ॥

( २० ) गणेशगीता-अ० १. मानसानखिलान्कामान्यदा धीमांस्त्यजेत्प्रिय । स्वात्मनि स्वेन संतुष्टःस्थिरबुद्धिस्तदोच्यते ५३ हे प्रिय ! जब यह बुद्धिमान् मनके सम्पूर्ण कामोंको त्यागन कर दे, अपने आत्मामें आपहीसे संतुष्ट हो तब यह स्थिर- बुद्धि कहाता है ॥ ५३ ॥ वितृष्णः सर्वसौख्येषु नोद्विग्नो दुःखसंगमे ॥ गतसाध्वसरुड्रागः स्थिरबुद्धिस्तदोच्यते ॥५४॥ किसीप्रकारके भी संसारी सुखोंमें तृष्णा न करनी,दुःखमें उद्विग्न न होना, भय, क्रोध और राग न होना यही स्थिर- बुद्धिका लक्षण है ॥ ५४ ॥ यथाऽयं कमठोऽङ्गानि संकोचयति सर्वतः ॥ विषयेभ्यस्तथा खानि संकर्षेद्योगतत्परः ॥५५॥ जिसप्रकारसे कछुआ सब ओरसे अपने अंग सिकोड लेता है इसीप्रकारसे योगीको उचित है कि विषयोंसे इंद्रियोंको खींचे५५ व्यावर्तन्तेऽस्य विषयास्त्यक्ताहारस्यवार्ष्मणः ॥ विना रागं च रागोऽपि दृष्ट्वा ब्रह्म विनश्यति५६ भोजन त्यागनेवालेके विषय नष्ट होजाते हैं परन्तु उनका

भाषाटीकासमेत । ( २१ ) अनुभव बना रहता है परन्तु वैराग्यसे ब्रह्मकी प्राप्ति होनेसे वह राग भी नष्ट हो आता है ॥ ५६ ॥ विपश्चिद्यतते भूप स्थितिमास्थाय योगिनः ॥ मन्थयित्वेन्द्रियाण्यस्य हरंति बलतो मनः ५७ हे राजन् ! जिनके इन्द्रिय वशमें नहीं हैं, वे स्थिर प्रज्ञा- वाले नहीं होते हैं, इन्द्रियगण मोक्षके प्रयत्न करनेवाले विद्वान् पुरुषका भी मन हर लेती हैं,इसकारण इंद्रियोंको वशमें करनेका यत्न करना ॥ ५७ ॥ युक्तस्तानि वशे कृत्वा सर्वदा मत्परो भवेत् ॥ संयतानीन्द्रियाणीह यस्यासौ कृतधीर्मतः ५८॥ इन्द्रियोंको वशमें करके सदा योगीको मेरा परायण होना चाहिये, कारण कि जिसकी इन्द्रियें वशमें होगई हैं उसीको स्थिरप्रज्ञ कहते हैं ॥ ५८ ॥ चिन्तयानस्य विषयान्संगस्तेषूपजायते ॥ कामःसंजायते तस्मात्ततः क्रोधोऽभिवर्द्धते ५९॥ विषयोंकी चिन्ता करनेवाले पुरुषको उन सबोंमें अनुराग होजाता है, आसक्तिसे कामना होती है, उससे क्रोधकी उत्पत्ति होती है ॥ ५९ ॥

( २२ ) गणेशगीता-अ० १. क्रोधादज्ञानसंभूतिर्विभ्रमस्तु ततः स्मृतेः ॥ भ्रंशात्स्मृतेर्मतेर्ध्वंसस्तद्ध्वंसात्सोऽपि नश्यति६० क्रोधसे अज्ञान और इससे स्मृतिभ्रंश होता है, स्मृति- भ्रंशसे बुद्धि नष्ट होती है, और बुद्धि नष्ट होनेसे यह प्राणी नष्ट होजाता है ॥ ६० ॥ विना द्वेषं च रागं च गोचरान्यस्तु खैश्चरेत् ॥ स्वाधीनहृदयो वश्यैः संतोषं स समृच्छति ६१॥ अनुराग और द्वेषसे रहित अपने वशमें आई इन्द्रियोंसे विषयोंका भोग करके भी चित्तको वशीभूत किये जन शान्तिको प्राप्त होते हैं ॥ ६१ ॥ त्रिविधस्यापि दुःखस्य संतोषं विलयो भवेत् ॥ प्रज्ञया संस्थितश्चायं प्रसन्नहृदयो भवेत् ॥६२॥ एक संतोषकी प्राप्ति होनेसे तीनों प्रकारके दुःख नष्ट होजाते हैं, इसीप्रकार स्थिरप्रज्ञावालेका मन प्रसन्न होजाता है ॥६२॥ विना प्रसादं न मतिर्विना मत्या न भावना ॥ विना तां न समो भूप विना तेन कुतः सुखम् ६३ विना चित्तप्रसन्न हुए बुद्धिकी प्राप्ति नहीं और बुद्धिके

भाषाटीकासमेत । ( २३ ) विना श्रद्धा नहीं, श्रद्धाके विना शान्ति नहीं और शान्तिके विना सुख नहीं होता ॥ ६३ ॥ इंद्रियाणांन्विचरतो विषयाननुवर्तते ॥ यन्मनस्तन्मतिं हन्यादप्सु नावं मरुद्यथा॥६४॥ पवन जिसप्रकार नावको जलमें डुबो देती है वैसेही मन विषयोंमें विचरनेवाले अवशीभूत इंद्रियरूपी घोडोंमेंसे जिसके अनुकूल चलता, वही उसकी प्रज्ञाको हर लेता है ॥ ६४ ॥ या रात्रिः सर्वभूतानां तस्यां निद्राति नैव सः॥ न स्वपंतीह ते यत्र ता रात्रिस्तस्य भूमिप ६५ अज्ञानसे आच्छादित सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये जो आत्म- ज्ञान रात्रि स्वरूप है, उसमें इन्द्रिय वश करनेहारे संयमी योगी जागते हैं, और जिस विषयबुद्धिमें संपूर्ण प्राणी जागते हैं, वह विषय भोग ज्ञानियोंके लिये रात्रि स्वरूप है ॥ ६५ ॥ सरितां पतिमायांति वनानि सर्वतो यथा ॥ आयांति यं तथा कामा न स शांतिं क्वचिल्लभेत् ६६ जिसप्रकारसे सब नदियें और जल समुद्रमें प्रवेश कर जाते हैं और उसकी तृप्ति नहीं होती, इसीप्रकार सब कामना पूर्ण होनेवालेको भी शान्ति नहीं होती ॥ ६६ ॥

( २४ ) गणेशगीता-अ० १. अतस्तानीह संरुध्य सर्वतः खानि मानवः ॥ स्वस्वार्थेभ्यः प्रधावंति बुद्धिरस्य स्थिरा तदा ६७ इसकारण प्राणीको उचित है कि, सब प्रकारसे विषयोंकी ओर धावमान होती हुई इन्द्रियोंको वशमें करे, तब इसकी बुद्धि स्थिर हो ॥ ६७ ॥ ममताहंकृती त्यक्त्वा सर्वान्कामांश्च यस्त्यजेत् ॥ नित्यं ज्ञानरतो भूत्वा ज्ञानान्मुक्तिं स यास्यति॥ जो ममत्व अहंकार और सब कामनाओंका त्याग करताहै, नित्य ज्ञानमें मग्न रहताहै वह ज्ञानसे मुक्तिको प्राप्त होजाता है ६८ एवं ब्रह्मधियं भूप यो विजानाति दैवतः ॥ तुर्यामवस्थां प्राप्यापि जीवन्मुक्तिं प्रयास्यति ६९ ॐतत्सादीति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासुयोगामृता- र्थशास्त्रे श्रीमन्महागणेशपुराणे उत्तरखण्डे बाल- चरिते गजाननवरेण्यसंवादे सांख्यसारार्थ- योगो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥