भारतकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

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( ४४ ) गणेशगीता अ० ३. इनकी गति जाननी महाकठिन है, तू मेरा भक्त है इससे कहता हूं ॥ २३ ॥ क्रियायामक्रियाज्ञानमक्रियायां क्रियामतिः ॥ यस्यस्यात्सहिमत्येँस्मिँल्लोकेमुक्तोऽखिलार्थकृत्। क्रियामें अक्रियाका ज्ञान, और अक्रियामें क्रियाकी मति जिसकी होती है वही इस लोकमें सब कर्मका करनेवाला हो तौभी मुक्त होजाता है ☸ ॥ २४ ॥ कर्मांकुरवियोगेन यः कर्माण्यारभेन्नरः ॥ तत्त्वदर्शननिर्दग्धक्रियमाहुर्बुधा बुधम् ॥ २५ ॥ जो कर्मोंके अंकुरके वियोगसे अर्थात् संकल्प और कामना रहित कर्म करते हैं तत्त्वके जाननेसे उनकी सब क्रिया दग्ध हैं, ऐसा पंडितजन कहते हैं ॥ २५ ॥

  • अर्थात् देह और इंद्रिय आदिके जितने उचित और निषिद्ध कर्म हैं उनमेंसे किसकोभी आत्मा नहीं करता है और सब बाह्य कर्म त्यागने परभी यदि देहादिको आत्मा मानाजाय तौभी अन्तर शारीरिक क्रियां होती है वहभी आत्माकी क्रिया समझी जाती है एवं उनसे आत्माको संसारका दुःख आवरण करलेता है, इस प्रकारका जिन्हें विश्वास है वही जनोंमें बुद्धिमान् हैं और सब कर्म करते रहनेपरभी योगी हैं॥