भारतकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

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(३०) गणेशगीता-अ० २. अन्तरात्मनि यः प्रीत आत्मारामोऽखिलप्रियः॥ आत्मतृप्तो नरो यः स्यात्तस्यार्थो नैव विद्यते १७ जो अन्तरात्मामें प्रीति करनेवाले हैं, वही आत्माराम और सबके प्यारे हैं, जो प्राणी आत्मतृप्त हैं उन्हें किसी बातकी इच्छा नहीं रहती ॥ १७ ॥ कार्याकार्यकृतीनां स नैवाप्नोति शुभाशुभे ॥ किंचिदस्य न साध्यं स्यात्सर्वजंतुषु सर्वदा १८॥ इस प्रकारके प्राणी कार्याकार्य करके भी शुभ अशुभ फलको नहीं प्राप्त होते, यह कुछ करें अथवा न करें तोभी उनको कुछ प्रयोजन नहीं, सम्पूर्ण प्राणियोंमें इनका कोई भी प्रयोजनाधार नहीं, ऐसे पुरुषोंको कुछ साध्य नहीं ॥१८॥ अतोऽसक्ततया भूप कर्त्तव्यं कर्म जंतुभिः ॥ सक्तोऽगतिमवाप्नोति मामवाप्नोति तादृशः॥१९॥ इस कारण हे राजन् ! आसक्ति रहित होकर प्राणियोंको कर्म करना उचित है, जो आसक्त होताहै उसकी दुर्गति होती है, और अनासक्त मुझे प्राप्त हो जाताहै ॥ १९ ॥ परमां सिद्धिमापन्नाः पुरा राजर्षयो द्विजाः ॥ संग्रहाय हि लोकानां तादृशं कर्म चारभेत् २०॥