गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( ३१ ) हे राजन् ! कर्म करनेसे बहुतसे राजर्षि परमसिद्धिको प्राप्त हुए हैं. लोक संग्रहके निमित्तही अनासक्त होकर कर्म करने उचित हैं ॥ २० ॥ श्रेयान्यत्कुरुते कर्म तत्करोत्यखिलो जनः ॥ मनुते यत्प्रमाणं स तदेवानुसरत्यसौ ॥२१॥ जो कर्म महत् पुरुष करते हैं, वही कर्म और सब करते हैं वह जिसका प्रमाण करते हैं, दूसरे भी उसीको मानते हैं ॥२१॥ विष्टपे मे न साध्योऽस्ति कश्चिदर्थो नराधिप ॥ अनालब्धश्च लब्धव्यःकुर्वे कर्म तथाप्यहम् २२॥ हे राजन् ! मुझे कोई वस्तु स्वर्गादिमें दुर्लभ नहीं है, और मैं कर्म करके किसी अलभ्य वस्तुको प्राप्त होनेकी भी इच्छा नहीं करताहूं ॥ २२ ॥ न कुर्वेऽहं यदा कर्म स्वतन्त्रोऽलसभाविताः ॥ करिष्यन्ति मम ध्यानं सर्वे वर्णा महामते॥२३॥ और जो मैं आलसी और स्वतंत्र होकर कर्म न करूं तो सबही वर्ण कर्म छोडकर केवल मेरा ध्यानहीं करें ॥ २३ ॥ भविष्यन्ति ततो लोका उच्छिन्नाः संप्रदायिनः॥ हंता स्यामस्य लोकस्य विधाता शंकरस्यच २४॥