गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २६ ) गणेशगीता-अ० २. अनारम्भेण वैधानां निष्क्रियः पुरुषो भवेत् ॥ न सिद्धियाति संत्यागात्केवलात्कर्मणो नृप॥३॥ कर्मोंके आरंभ न करनेसे यह पुरुष निष्क्रिय हो जाता है, हे राजन् ! केवल कर्मोंहीके त्यागनेसे सिद्धि नहीं होती ॥३॥ कदाचिदक्रियः कोऽपि क्षणं नैवावतिष्ठते ॥ अस्वतंत्रः प्रकृतिजैर्गुणैः कर्म च कार्यते ॥४॥ किसी दशामें क्षणमात्रभी कर्मविना किये कोई नहीं रह सकता है, राग द्वेषादि स्वाभाविक गुण सबको ही अवश करके कर्म कराते हैं, तत्त्वज्ञान होनेसे प्रथम कर्म त्यागनेसे चित्तकी क्रिया नहीं हो सकती ॥ ४ ॥ कर्मकारीन्द्रियग्रामं नियम्यास्ते स्मरन्पुमान् ॥ तद्गोचरान्मंदचित्तो धिगाचारः स भाष्यते ॥५॥ जो कर्म करनेवाला, इन्द्रियोंको मनहीं मनमें रोककर इन्द्रियोंके विषयोंका स्मरण करता है, उस दुरात्माको तुच्छ आचारवाला कहा जाता है ॥ ५ ॥ तद्ग्रामं संनियम्यादौ मनसा कर्म चारभेत् ॥ इंद्रियैः कर्मयोगं यो वितृष्णः स परो नृप ॥६॥ और जो मनसे इन्द्रियोंको संयम करके, कर्म इन्द्रियोंसे