गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २८ ) गणेशगीता-अ० २. वर्णान्सृष्ट्वावदं चाहं सयज्ञांस्तान्पुरा प्रिय ॥ यज्ञेन ऋध्यतामेष कामदः कल्पवृक्षवत् ॥१०॥ पूर्व कालमें मैने यज्ञरूपी नित्यकर्मकेही साथ साथ मनु- ष्योंको रचकर कहा-हे मनुष्यो ! तुम वृद्धिको प्राप्त हो, यह क्रिया तुम्हारी इष्ट सिद्धिकी देनेवाली हो ॥ १० ॥ सुरांश्चान्नेन प्रीणध्वं सुरास्ते प्रीणयन्तु वः ॥ लभत्वं परमं स्थानमन्योन्यप्रीणनात्स्थिरम् ११ तुम देवताओंको अन्नसे तृप्त करो, देवता तुमको वर्षा आदिसे प्रसन्न करेंगे, इसप्रकार परस्पर वृद्धि करते हुए तुम और देवता सब श्रेष्ठ स्थानको प्राप्त हो ॥ ११ ॥ इष्टा देवाः प्रदास्यन्ति भोगानिष्टान्सुतर्पिताः ॥ तैर्दत्तांस्तानरस्तेभ्योऽदत्त्वाभुङ्क्ते स तस्करः १२ देवता प्रसन्न होकर तुम्हारे मनोवांछित मनोरथोंको पूर्ण करेंगे, उन देवतोंके दिये पदार्थोंसे उनका आराधन किये विना जो भोग भोगता है वह चोर है ॥ १२ ॥ हुतावशिष्टभोक्तारो मुक्ताः स्युः सर्वपातकैः ॥ अदन्त्येनो महापापा आत्महेतोःपचन्ति ये १३ जो देवताका आराधनरूप यज्ञ करके अवशिष्ट अन्न