भारतकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

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( ५० ) गणेशगीता अ ३. ततः सर्वाणि भूतानि स्वात्मन्येवाभिपश्यति ॥ अतिपापरतो जन्तुस्ततस्तस्मात्प्रमुच्यते ॥४४॥ सत्संगसे ज्ञान मिलनेसे यह सब प्राणियोंको अपनेमेंही देखता है, इससे अतिपापी प्राणीभी मुक्त होजाता है ॥४४॥ द्विविधान्यपि कर्माणि ज्ञानाग्निर्दहति क्षणात् ॥ प्रसिद्धोऽग्निर्यथा सर्वं भस्मतां नयति क्षणात्४५ जिस प्रकारसे प्रसिद्ध जलती अग्नि सब लकडियोंको क्षणमें भस्म कर देती है, इसी प्रकार ज्ञानअग्निमें पाप पुण्य दोनों प्रकारके कर्म नष्ट हो जाते हैं ॥ ४५ ॥ न ज्ञानसमतामेति पवित्रमितरन्नृप ॥ आत्मन्येवावगच्छन्ति योगात्कालेनयोगिनः४६ हे राजन् ज्ञानकी समान और कोई वस्तु पवित्र नहीं, योग सिद्ध महात्मा उस ज्ञानको काल उपस्थित होनेपर स्वयंही प्राप्त करता है ॥ ४६ ॥ भक्तिमानिन्द्रियजयी तत्परो ज्ञानमाप्नुयात् ॥ लब्ध्वा तत्परमं मोक्षं स्वल्पकालेन यात्यसौ ४७ भक्तिमान्, इन्द्रिय जीतनेमें तत्पर पुरुषही ज्ञानको प्राप्त कर सकता है,और ज्ञान प्राप्त होनेसे थोडे समयमेंही मुक्तिको प्राप्त हो जाता है ॥ ४७ ॥

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