गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५२ ) गणेशगीता-अ० ४. इस कारण ज्ञानरूप खड्गसे मनके अज्ञानसे उत्पन्न हुई संशयको बलसे काटकर मनुष्यको योगका आश्रय लेना उचित है ॥ ५० ॥ ॐतत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृतार्थ- शास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उ०श्रीगजाननवरेण्यसम्वादे पण्डित- ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां विज्ञानप्रति- पादनोनाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ वरेण्य उवाच । संन्यस्तिश्चैव योगश्च कर्मणां वर्ण्यते त्वया ॥ उभयोर्निश्चितं त्वेकं श्रेयो यद्वद मे प्रभो ॥१॥ वरेण्य बोले हे भगवन् ! आप कर्मसंन्यास अर्थात् निष्काम भावसे कर्म करते करते विशुद्धचित्त होनेपर कर्मत्याग कर- नेको ज्ञानका कारण कहकर फिर कर्मयोगको ज्ञानका कारण कहतेहो, इससे मुझे सन्देह होता है इन दोनोंमें जो हित हो सो कहो ॥ १ ॥ श्रीगजानन उवाच । क्रियायोगो वियोगश्चाप्युभौ मोक्षस्य साधने ॥ तयोर्मध्ये क्रियायोगस्त्यागात्तस्य विशिष्यते २