गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( ५३ ) श्रीगणेशजी बोले कि, अधिकारियोंके भेदसे कर्मयोग और कर्मसंन्यास दोनों मुक्तिके साधन हैं, उन दोनोंमें कर्म- संन्याससे कर्मयोग श्रेष्ठ है ॥ २ ॥ द्वन्द्वदुःखसहोऽद्वेष्टा यो न कांक्षति किञ्चन ॥ मुच्यते बंधनात्सद्यो नित्यं संन्यासवान्सुखम् ३ जो द्वंद्व और दुःखभी सहकर किसीसे द्वेष नहीं करते; और किसी बातकी इच्छा नहीं करते, ऐसे प्राणी अनायाससे तत्काल कर्म बन्धनसे मुक्त होते हैं ॥ ३ ॥ वदंति भिन्नफलकौ कर्मणस्त्यागसंग्रहौ ॥ मूढाल्पज्ञास्तयोरेकं संयुञ्जीत विचक्षणः ॥ ४ ॥ कर्मसंन्यास और कर्मयोगको अज्ञानीही पृथक् २ कहते हैं परन्तु पंडितगण उन्हें एकही कहते हैं ॥ ४ ॥ यदेव प्राप्यते त्यागात्तदेव योगतः फलम् ॥ संग्रहं कर्मणो योगं यो विंदति स विंदति ॥५॥ जो फल कर्मसंन्याससे मिलता है, वही फल कर्मयोगसे प्राप्त होता है, कर्मसंन्यास और कर्मयोगको जो यथार्थ जानता है वही ज्ञाता है ॥ ५ ॥