गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( ५५ ) वह इस प्रकार पापपुण्यसे लिप्त नहीं होता जैसा सूर्यका बिम्ब जलमें पडता है और वह उससे लिप्त नहीं होता ॥ ९ ॥ कायिकं वाचिकं बौद्धमैन्द्रियं मानसं तथा ॥ त्यक्ताशां कर्म कुर्वन्ति योगज्ञाश्चित्तशुद्धये १०॥ योगके जाननेवाले चित्तशुद्धिके निमित्त मन वचन बुद्धि इन्द्रिय मनसे अनुराग त्यागकर कर्म करते हैं ॥ १० ॥ योगहीनो नरः कर्म फलेहया करोत्यलम् ॥ बध्यते कर्मबीजैः स ततो दुःखं समश्नुते॥११॥ योगहीन मनुष्य कर्मोंको फलकी इच्छासे करता है,वह कर्म बीजसे बंधता है, और इसीसे दुःखको प्राप्त होता है ॥११॥ मनसा सकलं कर्म त्यक्त्वा योगी सुखं वसेत् ॥ न कुर्वन्कारयन्वापि नन्दञ्श्वभ्रे सुपत्तने ॥१२॥ योगीको उचित है मनसे सम्पूर्ण कर्मोंको त्यागकर,सुखसे रहे, व उत्तम नगरमें वास करता हुआ भी न कुछ करे न करावे ॥ १२ ॥ न क्रिया न च कर्तृत्वं कस्यचित्सृज्यते मया ॥ न क्रियाबीजसंपर्कःशक्त्यातात्क्रियतेऽखिलम् १३