गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( ५७ ) ज्ञानविज्ञानसंयुक्ते द्विजे गवि गजादिषु ॥ समेक्षणा महात्मानः पण्डिताः श्वपचे शुनि १७॥ ज्ञानविज्ञानयुक्त महात्मा पंडितजन ब्राह्मण,गौ,हस्ती आदि प्राणी, चांडाल, श्वान इन सबमें समान दृष्टि रखते हैं ॥१७॥ वश्यः स्वर्गो जगत्तेषां जीवन्मुक्ताः समेक्षणाः ॥ यतोऽदोषं ब्रह्म समं तस्मात्तैर्विषयीकृतम् ॥१८॥ जिनका मन समतामें स्थित है, इस लोकमें जीते ही वे संसार और स्वर्गको जीत चुके हैं कारण कि ब्रह्म निर्दोष और समान है, इसकारण वे ब्रह्ममें स्थित हैं ॥ १८ ॥ प्रियाप्रिये प्राप्य हर्षद्वेषौ ये प्राप्नुवन्ति न ॥ ब्रह्माश्चिता असंमूढा ब्रह्मज्ञाः समबुद्धयः ॥१९॥ जो महात्मा प्रिय और अप्रियकी प्राप्तिमें हर्षशोक नहीं करते, वे ज्ञानयुक्त ब्रह्ममें स्थित ब्रह्मके जाननेवालेके समान बुद्धिमान् हैं ॥ १९ ॥ वरेण्य उवाच । किं सुखं त्रिषु लोकेषु देवगन्धर्वयोनिषु ॥ भगवन्कृपया तन्मे वद विद्याविशारद ॥ २० ॥