गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६६ ) गणेशगीता-अ० ५. स्मृतिका लोप होना, गूँगापन, बधिरता, मन्दता, ज्वर, जडता यह सब कुछ दोष अज्ञानसे योगीको होते हैं ॥ १० ॥ एते दोषाः परित्याज्या योगाभ्यसनशालिना ॥ अनादरे हि चैतेषां स्मृतिलोपादयो ध्रुवम्॥११॥ योगाभ्यासीको यह सब दोष त्याग करने चाहिये, इनमें जो आलस्य करे तो अवश्य स्मृतिलोपादि दोष होते हैं, इससे उपरोक्त स्थानोंमें योगसाधन न करै ॥ ११ ॥ नातिभुञ्जन्सदा योगी नामुञ्जन्नातिनिद्रितः ॥ नातिजाग्रत्सिद्धिमेति भूप योगं सदाभ्यसन् १२ योगी सदा थोडा भोजन करै, विना भोजन किये भी न रहै, न बहुत सोवै, न बहुत जागै, इस प्रकार सदा योगाभ्यास करनेसे सिद्धिको प्राप्त हो जाता है ॥ १२ ॥ संकल्पजांस्त्यजेत्कामान्नियताहारजागरः ॥ नियम्य खगणं बुद्ध्या विरमेत शनैः शनैः १३॥ सम्पूर्ण इच्छा और कामनाओंको त्याग करे, थोडा भोजन करै, जागरणशील हो, बुद्धिसे सब इंद्रियोंको वशकर शनैः शनैः विरामको प्राप्त हो ॥ १३ ॥