गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( ६७ ) ततस्ततः कृषेदेतद्यत्र यत्रानुगच्छति ॥ धृत्यात्मवशगं कुर्याच्चित्तं चञ्चलमाहतः ॥१४॥ जिस जिस स्थानमें मन जाय उस उस स्थानसे उसे खींचे और धैर्यतासे उसे अपने वश करै, कारण कि वह महा- चंचल है ॥ १४ ॥ एवं कुर्वन्सदा योगी परां निर्वृतिमृच्छति ॥ विश्वस्मिन्निजमात्मानंविश्वंचस्वात्मनीक्षते १५ योगी सदा इसप्रकार करनेसे परम शांतिको प्राप्त होता है, जो संसारको अपनी आत्मामें और आत्माको संसारमें देखते हैं ॥ १५ ॥ योगेन यो मामुपैति तमुपैम्यहमादरात् ॥ मोच्यामि न मुञ्चामि तमहं मां स न त्यजेत् १६ योगसे जो मुझको प्राप्त होता है, उसको मैं आदरसे प्राप्त होता हूं, और जो मुझको नहीं छोडता है उसको मैं नहीं छोडताहूं, संसारसे मुक्त कर देता हूं ॥ १६ ॥ सुखे सुखेतरे द्वेषे क्षुधि तोषे समस्तृषि ॥ आत्मसाम्येन भूतानि सर्वगं मां च वेत्ति यः १७॥