गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(६८) गणेशगीता-अ० ५. सुख, दुःख, द्वेष, क्षुधा, शांति, तृपा इनमें जो आत्माके समान सब प्राणियोंको देखता है, और जो मुझे जानता है ॥ १७ ॥ जीवन्मुक्तः स योगीन्द्रः केवलं मयि संगततः ॥ ब्रह्मादीनां च देवानां स वंद्यः स्याज्जगत्त्रये॥१८॥ ऐसे योगी जो केवल मुझमें संगति करनेवाले हैं, वे जीवन्मुक्त हैं, वह त्रिलोकीमें ब्रह्मादिक देवताओंसे नमस्कार करने योग्य हैं ॥ १८ ॥ वरेण्य उवाच । द्विविधोऽपि हि योगोऽयमसंभाव्यो हि मे मतः॥ यतोऽन्तःकरणं दुष्टं चञ्चलं दुर्ग्रहं विभो ॥१९॥ वरेण्यने कहा भगवन् ! यह दोनों प्रकारकी योगसिद्धि मैं महाकठिन देखता हूं कारण कि मन बडा दुष्ट और चंचल है इसका निग्रह करना कठिन है ॥ १९ ॥ श्रीगजानन उवाच । यो निग्रहं दुर्ग्रहस्य मनसः संप्रकल्पयेत् ॥ घटीयन्त्रसमादस्मान्मुक्तः संसृतिचक्रकात् २०॥ श्रीगणेशजी बोले हे राजन् ! जो निग्रह करनेमें कठिन, इस