भारतकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेत । ( ६९ ) मनका निग्रह करता है, वह घटीयंत्रके समान घूमनेवाले इस संसार चक्रसे मुक्त हो जाता है ॥ २० ॥ विषयैः क्रकचैरेतत्संस्सृष्टं चक्रकं दृढम् ॥ जनश्छेत्तुं न शक्नोति कर्मकीलैः सुसंवृतम्॥२१॥ विषयरूपी आरोंसे यह दृढ चक्र बना हुआ है और कर्म- रूपी कीलोंसे जडा हुआ है इसकारण साधारण मनुष्य इसके छेदन करनेको समर्थ नहीं होते ॥ २१ ॥ अतिदुःखं च वैराग्यं भोगाद्वैतृष्ण्यमेव च ॥ गुरुप्रसादः सत्संग उपायास्तज्जये अमी ॥२२॥ अतिशय दुःख वैराग्य, भोग तृष्णाका त्याग, गुरुकी प्रसन्नता, सत्संग, यह इसके जीतनेके उपाय हैं ॥ २२ ॥ अभ्यासाद्वा वशीकुर्यान्मनो योगस्य सिद्धये ॥ वरेण्य दुर्लभो योगो विनास्य मनसो जयात्२३ योगसिद्धिके निमित्त अभ्याससे मनको अपने वशमें करै, हे वरेण्य ! विना मनके जीते योग महाकठिन है ॥ २३ ॥ वरेण्य उवाच । योगभ्रष्टस्य को लोकः का गतिःकिं फलं भवेत् ॥ विभो सर्वज्ञ मे छिंधि संशयं बुद्धिचक्रभृत् २४॥