भारतकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

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( ७० ) गणेशगीता-अ० ५. वरेण्य बोले भगवन् ! योगभ्रष्टको किस लोककी प्राप्ति और उसकी क्या गति होती है, क्या फल होता है हे सर्वज्ञ ! हे बुद्धिरूपी चक्रके धारण करनेवाले ! यह मेरा संदेह छेदन कीजिये ॥ २४ ॥ श्रीगजानन उवाच । दिव्यदेहधरो योगाद्द्रष्टः स्वभोगमुत्तमम् ॥ भुक्त्वा योगिकुलेजन्म लभेच्छुद्धिमतां कुले २५ श्रीगणेशजी बोले हे राजा ! योगभ्रष्ट पुरुष भी दिव्य देह धारणकर स्वर्गमें जाते हैं, वहां कर्मोंके फल उत्तम सुख भोग कर शुद्धता युक्त योगियोंके कुलमें जन्म लेते हैं ॥ २५ ॥ पुनर्योगी भवत्येष संस्कारात्पूर्वकर्मजात् ॥ नहि पुण्यकृतां कश्चिन्नरकं प्रतिपद्यते ॥ २६ ॥ और फिर भी यह पूर्व जन्मोंके संस्कारसे योगी होता है कोई भी पुण्यकर्म करनेवाला नरकको नहीं जाता ॥ २६ ॥ ज्ञाननिष्ठात्तपोनिष्ठात्कर्मनिष्ठान्नराधिप ॥ श्रेष्ठो योगी श्रेष्ठतमो भक्तिमान्मयि तेषु यः २७ ॐतत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृतार्थ- शास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उ० श्रीगजाननवरेण्यसंवादे योगावृत्तिप्रशंसनो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥