गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( ७१ ) हे राजन् ! ज्ञाननिष्ठासे तपकी निष्ठावालोंसे कर्मनिष्ठासे जो योगसे मुझमें भक्ति करता है वह श्रेष्ठ है ॥ २७ ॥ ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृतार्थशास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उ० श्रीगजाननवरेण्यसंवादे पंडित- ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां योगावृत्ति- प्रशंसनो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ श्रीगजानन उवाच ॥ ईदृशं विद्धि मे तत्त्वं मद्गतेनान्तरात्मना ॥ यज्ज्ञात्वा मामसंदिग्धं वेत्सि मोक्ष्यसि सर्वगम् १ श्रीगणेशजी बोले हे राजन् ! इस प्रकार मुझमें मन लगाकर मेरा तत्त्व जानो जिसके जाननेसे मुझे सर्वगत और यथार्थ जानकर मुक्त हो जाओगे ॥ १ ॥ तत्तेऽहं शृणु वक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया ॥ अस्ति ज्ञेयं यतो नान्यन्मुक्तेश्च साधनं नृप॥२॥ हे राजन् ! लोकोंके ऊपर अनुग्रहकी इच्छासे वह तत्त्व मैं तुमसे वर्णन करता हूं जिसके जाननेसे दूसरे मुक्तिके साधन जाननेकी आवश्यकता नहीं रहती ॥ २ ॥ ज्ञेया मत्प्रकृतिः पूर्वं ततः स्याज्ज्ञानगोचरः ॥ ततो विज्ञानसंपत्तिर्मयि ज्ञाते नृणां भवेत् ॥३॥