भारतकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

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( ७२ ) गणेशगीता-अ० ६. प्रथम तौ मेरी प्रकृति जाननी उचित है, उससे ज्ञान होता है, इसके उपरान्त मेरा ज्ञान होनेसे प्राणियोंको विज्ञान सम्पत्तिकी प्राप्ति होती है ॥ ३ ॥ क्ष्मानलौ खमहंकारः कं चित्तं धीसमीरणौ ॥ रवीन्दू यागकृच्चैकादशधा प्रकृतिर्मम ॥ ४ ॥ पृथ्वी, अग्नि, आकाश, अहंकार, होमद्रव्य, चित्त, बुद्धि, वायु, रवि, चंद्र, यागकर्ता, यह ग्यारह प्रकारकी मेरी प्रकृति है॥४ अन्यां मत्प्रकृतिं वृद्धा मुनयः संगिरन्ति च ॥ तथा त्रिविष्टपं व्याप्तं जीवत्वं गतयानया ॥ ५ ॥ औरभी वृद्ध मुनिजन ऐसा वर्णन करते हैं, कि आनेजानेवाली जीवत्वको प्राप्त हुई त्रिलोकीमें व्याप्त यह भी मेरी प्रकृति है॥५॥ आभ्यामुत्पाद्यते सर्वं चराचरमयं जगत् ॥ संगाद्विश्वस्य संभूतिः परित्राणं लयोऽप्यहम्॥६॥ प्रकृतिपुरुषसेही चराचर जगत् उत्पन्न होताहै इसीके संगसे मुझसे इस जगत्की उत्पत्ति पालन और नाश होता है ॥६॥ तत्त्वमेतन्निबोद्धुं मे यतते कश्चिदेव हि ॥ वर्णाश्रमवतां पुंसां पुरा चीर्णेन कर्मणा ॥ ७ ॥