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गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

( ७० ) गणेशगीता-अ० ५. वरेण्य बोले भगवन् ! योगभ्रष्टको किस लोककी प्राप्ति और उसकी क्या गति होती है, क्या फल होता है हे सर्वज्ञ ! हे बुद्धिरूपी चक्रके धारण करनेवाले ! यह मेरा संदेह छेदन कीजिये ॥ २४ ॥ श्रीगजानन उवाच । दिव्यदेहधरो योगाद्द्रष्टः स्वभोगमुत्तमम् ॥ भुक्त्वा योगिकुलेजन्म लभेच्छुद्धिमतां कुले २५ श्रीगणेशजी बोले हे राजा ! योगभ्रष्ट पुरुष भी दिव्य देह धारणकर स्वर्गमें जाते हैं, वहां कर्मोंके फल उत्तम सुख भोग कर शुद्धता युक्त योगियोंके कुलमें जन्म लेते हैं ॥ २५ ॥ पुनर्योगी भवत्येष संस्कारात्पूर्वकर्मजात् ॥ नहि पुण्यकृतां कश्चिन्नरकं प्रतिपद्यते ॥ २६ ॥ और फिर भी यह पूर्व जन्मोंके संस्कारसे योगी होता है कोई भी पुण्यकर्म करनेवाला नरकको नहीं जाता ॥ २६ ॥ ज्ञाननिष्ठात्तपोनिष्ठात्कर्मनिष्ठान्नराधिप ॥ श्रेष्ठो योगी श्रेष्ठतमो भक्तिमान्मयि तेषु यः २७ ॐतत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृतार्थ- शास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उ० श्रीगजाननवरेण्यसंवादे योगावृत्तिप्रशंसनो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

भाषाटीकासमेत । ( ७१ ) हे राजन् ! ज्ञाननिष्ठासे तपकी निष्ठावालोंसे कर्मनिष्ठासे जो योगसे मुझमें भक्ति करता है वह श्रेष्ठ है ॥ २७ ॥ ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृतार्थशास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उ० श्रीगजाननवरेण्यसंवादे पंडित- ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां योगावृत्ति- प्रशंसनो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ श्रीगजानन उवाच ॥ ईदृशं विद्धि मे तत्त्वं मद्गतेनान्तरात्मना ॥ यज्ज्ञात्वा मामसंदिग्धं वेत्सि मोक्ष्यसि सर्वगम् १ श्रीगणेशजी बोले हे राजन् ! इस प्रकार मुझमें मन लगाकर मेरा तत्त्व जानो जिसके जाननेसे मुझे सर्वगत और यथार्थ जानकर मुक्त हो जाओगे ॥ १ ॥ तत्तेऽहं शृणु वक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया ॥ अस्ति ज्ञेयं यतो नान्यन्मुक्तेश्च साधनं नृप॥२॥ हे राजन् ! लोकोंके ऊपर अनुग्रहकी इच्छासे वह तत्त्व मैं तुमसे वर्णन करता हूं जिसके जाननेसे दूसरे मुक्तिके साधन जाननेकी आवश्यकता नहीं रहती ॥ २ ॥ ज्ञेया मत्प्रकृतिः पूर्वं ततः स्याज्ज्ञानगोचरः ॥ ततो विज्ञानसंपत्तिर्मयि ज्ञाते नृणां भवेत् ॥३॥

( ७२ ) गणेशगीता-अ० ६. प्रथम तौ मेरी प्रकृति जाननी उचित है, उससे ज्ञान होता है, इसके उपरान्त मेरा ज्ञान होनेसे प्राणियोंको विज्ञान सम्पत्तिकी प्राप्ति होती है ॥ ३ ॥ क्ष्मानलौ खमहंकारः कं चित्तं धीसमीरणौ ॥ रवीन्दू यागकृच्चैकादशधा प्रकृतिर्मम ॥ ४ ॥ पृथ्वी, अग्नि, आकाश, अहंकार, होमद्रव्य, चित्त, बुद्धि, वायु, रवि, चंद्र, यागकर्ता, यह ग्यारह प्रकारकी मेरी प्रकृति है॥४ अन्यां मत्प्रकृतिं वृद्धा मुनयः संगिरन्ति च ॥ तथा त्रिविष्टपं व्याप्तं जीवत्वं गतयानया ॥ ५ ॥ औरभी वृद्ध मुनिजन ऐसा वर्णन करते हैं, कि आनेजानेवाली जीवत्वको प्राप्त हुई त्रिलोकीमें व्याप्त यह भी मेरी प्रकृति है॥५॥ आभ्यामुत्पाद्यते सर्वं चराचरमयं जगत् ॥ संगाद्विश्वस्य संभूतिः परित्राणं लयोऽप्यहम्॥६॥ प्रकृतिपुरुषसेही चराचर जगत् उत्पन्न होताहै इसीके संगसे मुझसे इस जगत्की उत्पत्ति पालन और नाश होता है ॥६॥ तत्त्वमेतन्निबोद्धुं मे यतते कश्चिदेव हि ॥ वर्णाश्रमवतां पुंसां पुरा चीर्णेन कर्मणा ॥ ७ ॥

भाषाटीकासमेत । ( ७३ ) इस मेरे तत्त्व जाननेके निमित्त वर्णाश्रमी पुरुषोंमें पूर्वज- न्मके कर्मानुसार कोई सहस्रोंमें एक यत्न करता है ॥ ७ ॥ साक्षात्करोति मां कश्चिद्यत्नवत्स्वपि तेषु च ॥ मत्तोऽन्यन्नेक्षते किंचिन्मयि सर्वं च वीक्षते ॥८॥ उन सहस्रों यत्नवानोंमें कोई एक मुझको साक्षात् करता है मुझसे अन्य और किसीको नहीं देखता, और मुझमें सम्पूर्ण जगत्को देखता है ॥ ८ ॥ क्षितौ सुगन्धरूपेण तेजोरूपेण चाग्निषु ॥ प्रभारूपेण पूष्ण्यब्जे रसरूपेण चाप्सु च ॥९॥ पृथिवीमें सुगन्धरूपसे, अग्निमें तेजोरूपसे, सूर्यमें और चन्द्रमें प्रभारूपसे, जलमें रसरूपसे मैं स्थित हूं ॥ ९ ॥ धीतपोबलिनां चाहं धीस्तपो बलमेव च ॥ त्रिविधेषु विकारेषु मदुत्पन्नेष्वहं स्थितः ॥१०॥ बुद्धिमान् तपस्वी बलिष्ठोंमें मैं बुद्धि, तप और बलरूपसे स्थित हूं, तीनप्रकारके विकार मुझसेही उत्पन्न हुए हैं और उन सबमें मैं स्थित हूं ॥ १० ॥ न मां विन्दति पापीयान्मायामोहितचेतनः ॥ त्रिविकारा मोहयति प्रकृतिर्मे जगत्त्रयम् ११॥

( ७४ ) गणेशगीता-अ० ६. मायासे मोहित चित्तवाले पापी मुझे नहीं जानते, तीन- प्रकारके विकार सत् रज तमवाली मेरी प्रकृति त्रिलोकीको मोहित करती है ॥ ११ ॥ यो मे तत्त्वं विजानाति मोहं त्यजति सोऽखिलम्। अनेकैर्जन्मभिश्चैवं ज्ञात्वा मां मुच्यते ततः १२ जो मेरे तत्त्वको जानता है, वह सम्पूर्ण मोहको त्याग कर- ता है, अनेक जन्मोंमें मुझे जानकर प्राणी मुक्त होजाताहै॥१२॥ अन्येनानाविधान्देवान्भजन्ते तान्व्रजन्ति ते ॥ यथायथा मतिं कृत्वा भजते मां जनोऽखिलः१३ जो अनेक प्रकारके देवतोंको भजन करते हैं, वे उन्हीको प्राप्त होते हैं, सम्पूर्ण मनुष्य जैसी जैसी मति करके मेरा भजन करते हैं ॥ १३ ॥ तथातथास्य तं भावं पूरयाम्यहमेव तम् ॥ अहं सर्वं विजानामि मां न कश्चिद्विबुद्ध्यते १४ उसी प्रकारसे मैं उनके भाव पूर्ण करताहूं, मैं सबको जानताहूं और मुझे कोई नहीं जानता ॥ १४ ॥ अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं न विदुः काममोहिताः ॥ नाहं प्रकाशतां यामि अज्ञानां पापकर्मणाम् १५

भाषाटीकासमेत । ( ७५ ) मुझ अव्यक्त गुप्त स्वरूपको कामसे मोहित दृष्टिवाले कोई नहीं जानते हैं, अज्ञानी और पापी पुरुषोंको मैं प्रगट नहीं होता हूं ॥ १५ ॥ यः स्मृत्वा त्यजति प्राणमन्ते मां श्रद्धयान्वितः॥ स यात्यपुनरावृत्तिं प्रसादान्मम भूभुज ॥ १६ ॥ जो अन्तसमय श्रद्धायुक्त होकर मुझे स्मरणकर अपना शरीर त्याग करता है, हे राजन् ! वह मेरी कृपासे मुक्त हो जाता है ॥ १६ ॥ यंयं देवं स्मरन्भक्त्या त्यजति स्वं कलेवरम् ॥ तत्तत्सालोक्यमायाति तत्तद्भक्त्या नराधिप १७ भक्तिपूर्वक जिस जिस देवताको यह प्राणी स्मरण करता हुआ कलेवरको त्याग करता है, हे राजन् ! उनकी भक्ति करनेसे उन्हींके लोकको प्राप्त होता है ॥ १७ ॥ अतश्चाहर्निशं भूप स्मर्तव्योऽनेकरूपवान् ॥ सर्वेषामप्यहं गम्यः स्रोतसामर्णवो यथा ॥१८॥ इस कारण हे राजन् ! रातदिन मेरे अनेक रूप स्मरण , करने योग्य हैं, सबको मैं ही प्राप्त होता हूं; जैसे नदियोंका

( ७६ ) गणेशगीता-अ० ६. जल सागरमें जाता है, ऐसे ही सब देवताओंकी आराधना मुझमें प्राप्त होती है ॥ १८ ॥ ब्रह्मविष्णुशिवेन्द्राद्याँल्लोकान्प्राप्य पुनः पतेत् ॥ यो मामुपैत्य संदिग्धः पतनं तस्य न क्वचित् १९ ब्रह्मा विष्णु शिव इन्द्रादि लोकोंको प्राप्त होकर यह फिर फिर संसारमें प्राप्त होता है, जो असंदिग्ध होकर मुझको प्राप्त होता है उसका फिर जन्म नहीं होता ॥ १९ ॥ अनन्यशरणो यो मां भक्त्या भजति भूमिप ॥ योगक्षेमौ च तस्याहं सर्वदा प्रतिपादये ॥२०॥ हे राजन् ! जो अनन्य शरण होकर भक्तिसे मेरा भजन करता है, मैं सदा उसके योग क्षेम ( मंगल ) का विधान करता हूं ॥ २० ॥ विविधा गतिरुद्दिष्टा शुक्ला कृष्णा नृणां नृप ॥ एकया परं ब्रह्म परया याति संसृतिम् ॥२१॥ ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगा- मृतार्थशास्त्रे श्रीमन्महागणेशपु० उत्तरखण्डे श्रीगजानन- वरेण्यसंवादे बुद्धियोगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

भाषाटीकासमेत । (७७) हे राजन् ! मनुष्योंकी कृष्ण और शुक्लपक्षके भेदसे अनेक गति हैं एकसे प्राणी संसारमें आता है, और दूसरीसे पर- ब्रह्मको प्राप्त होता है ॥ २१ ॥ ॐ तत्स० श्रीमद्० योगा० श्रीगणेश० पण्डितज्वालाप्रसाद- मिश्रकृतभाषाटीकायां बुद्धियोगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ वरेण्य उवाच । का शुक्ला गतिरुद्दिष्टा का च कृष्णा गजानन ॥ किं ब्रह्म संसृतिः का मे वक्तुमर्हस्यनुग्रहात् ॥१॥ वरेण्य बोले हे गजानन ! शुक्ला गति और कृष्णा गति किसको कहते हैं, ब्रह्म क्या है? और संसृति क्या है,सो आप मुझसे कृपाकर कहिये ॥ १ ॥ श्रीगजानन उवाच । अग्निर्ज्योतिरहः शुक्ला कर्माहिमयनं गतिः ॥ चान्द्रं ज्योतिस्तथा धूमो रात्रिश्च दक्षिणायनम्२ श्रीगणेशजी बोले हे राजन् ! अग्निके अभिमानी देवता और ज्योतिके अभिमानी देवता, दिवाभिमानी देवता, शुक्ल- पक्षाभिमानी देवता और अन्तमें उत्तरायणके षण्मासाभिमानी देवतोंका आश्रय करके जो चलते हैं, वह शुक्लागति कहाती ह, और धूमाभिमानी देवता, रात्रि अभिमानी देवता, कृष्ण-

( ७८ ) गणेशगीता-अ० ७. पक्ष अभिमानी देवता, चंद्र और ज्योति अभिमानी देवता, षण्मासाभिमानी देवताको आश्रय करके जो गमन करते हैं, वह कृष्णागति कहाती है ॥ २ ॥ कृष्णेते ब्रह्मसंसृत्योरवाप्तेः कारणं गती ॥ दृश्यादृश्यमिदं सर्वं ब्रह्मैवेत्यवधारय ॥ ३ ॥ इन्हीं दोनों गतियोंसे ब्रह्म और संसारकी प्राप्ति होती है, जो कुछ यह दृश्य और अदृश्य है, तुम इस सबको ब्रह्म जानो ३॥ क्षरं पञ्चात्मकं विद्धि तदन्तरक्षरं स्मृतम् ॥ उभाभ्यां यदतिक्रान्तं शुद्धं विद्धि सनातनम्४॥ पंचमहाभूतोंको क्षर कहते हैं, उसके अनन्तर अक्षर है, इन दोनोंको अतिक्रमणकर शुद्ध सनातन ब्रह्मको जानो ॥ ४ ॥ अनेकजन्मसंभूतिः संसृतिः परिकीर्तिता ॥ संसृतिं प्राप्नुवन्त्येते ये तु मां गणयन्ति न ॥ ५ ॥ अनेक जन्मोंकी संभूति ( ऐश्वर्य ) को आवागमन कहते हैं इस संसृतिको वे प्राप्त होते हैं जो मुझे नहीं गिन्ते ॥ ५ ॥ ये मां सम्यगुपासन्ते परं ब्रह्म प्रयान्ति ते ॥ ध्यानाद्यैरुपचारैर्मां तथा पञ्चामृतादिभिः ॥६॥

भाषाटीकासमेत । ( ७९ ) जो मुझे सम्यक् प्रकारसे उपासना करते हैं, वे परब्रह्मको प्राप्त होते हैं ध्यान पूजन और पंचामृतादि ॥ ६ ॥ स्नानवस्त्राद्यलंकारसुगन्धधूपदीपकैः ॥ नैवेद्यैः फलताम्बूलैर्दक्षिणाभिश्च योऽर्चयेत् ॥७॥ तथा स्नान, वस्त्र, अलंकार, उत्तम प्रकार गंध, धूप, दीप, नैवेद्य, फल, ताम्बूल, दक्षिणादिसे जो मेरी पूजा करता है ॥७॥ भक्त्यैकचेतसा चैव तस्येष्टं पूरयाम्यहम् ॥ एवं प्रतिदिनं भक्त्या मद्भक्तो मां समर्चयेत् ॥८॥ भक्ति तथा एकचित्तसे जो मेरा भजन करता है मैं उसके मनोरथ पूरे करता हूं इसप्रकार प्रतिदिन भक्तिसे मेरे भक्त मेरी पूजा करते हैं ॥ ८ ॥ अथवा मानसी पूजां कुर्वीत स्थिरचेतसा ॥ अथवा फलपत्राद्यैः पुष्पमूलजलादिभिः ॥९॥ अथवा स्थिरचित्तसे मानसी पूजा करै, अथवा फल पत्र पुष्प मूल जलसे ॥ ९ ॥ पूजयेन्मां प्रयत्नेन तत्तदिष्टं फलं लभेत् ॥ त्रिविधास्वपि पूजासु श्रेयसी मानसी मता १०

( ८० ) गणेशगीता-अ० ७. जो यत्न करके मेरी पूजा करता है, वह इष्ट फलको प्राप्त होता है, तीनों प्रकारकी पूजामें मानसी पूजा श्रेष्ठ है ॥१०॥ साप्युत्तमा मता पूजानिच्छया या कृता मम ॥ ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थो यतिश्च यः ११ वहभी यदि कामनारहित होकर कीजाय तौ अति उत्तम है, ब्रह्मचारी, गृहस्थ अथवा वानप्रस्थ या संन्यासी ॥ ११ ॥ एकां पूजां प्रकुर्वाणोऽप्यन्यो वा सिद्धिमृच्छति॥ मदन्यदेवं यो भक्त्या द्विषन्मामन्यदेवताम् १२ अथवा और जो कोई एक मेरी पूजाको करता है, वह सिद्धिको प्राप्त होता है, और मुझे छोडकर और मुझसे द्वेषकर जो और देवताका भक्तिसे पूजन करता है ॥ १२ ॥ सोऽपि मामेव यजते परं त्वविधितो नृप ॥ यो ह्यन्यदेवतां मां च द्विषन्नन्यां समर्च्चयेत् १३ हे राजन् ! अथवा मेरी पूजा विधिसे न करके और देव- ताका वा मेरा द्वेष पूजन करके करता है ॥ १३ ॥ याति कल्पसहस्रं स निरयान्दुःखभाक् सदा ॥ भूतशुद्धिं विधायादौ प्राणानां स्थापनं ततः १४

भाषाटीकासमेत। ( ८१ ) वह सहस्र कल्पवर्ष तक नरकमें पडकर सदा दुःख भोगता है, प्रथम भूतशुद्धि करके फिर प्राणायाम करे ॥ १४ ॥ आकृष्य चेतसो वृत्तिं ततो न्यासमुपक्रमेत् ॥ कृत्वान्तर्मातृकान्यासं बहिश्चाथ षडङ्गम् १५ फिर चित्तकी वृत्तियोंको आकर्षण करके न्यास करे, फिर मातृका न्यासकरे, फिर बहिरङ्ग षडङ्ग न्यास करे ॥ १५ ॥ न्यासं च मूलमंत्रस्य ततो ध्यात्वा जपेन्मनुम् ॥ स्थिरचित्तो जपेन्मन्त्रं यथा गुरुमुखागतम् १६॥ इसके उपरान्त मूलमंत्रका न्यास करके ध्यान करे और स्थिरचित्तसे गुरुमुखसे सुने मंत्रका जप करे ॥ १६ ॥ जपं निवेद्य देवाय स्तुत्वा स्तोत्रैरनेकधा ॥ एवं मां य उपासीत स लभेन्मोक्षमव्ययम्॥१७॥ फिर देवताके निमित्त जपको निवेदन कर अनेक प्रकारसे स्तोत्रका पाठ करे इस प्रकारसे जो मेरी उपासना करता है वह सनातनी मुक्तिको प्राप्त होता है ॥ १७ ॥ य उपासनया हीनो धिङ्नरो व्यर्थजन्मभाक् ॥ यज्ञोऽहमौषधं मन्त्रोऽग्निराज्यं च हविर्हुतम् १८॥

( ८२ ) गणेशगीता-अ० ७. जो मनुष्य उपासनासे हीन है उसे धिक्कार है और उसका जन्म वृथा है, यज्ञ, औषध, मंत्र, अग्नि, आज्य, हवि, हुत यह सब मेरा ही स्वरूप है ॥ १८ ॥ ध्यानं ध्येयं स्तुतिं स्तोत्रं नतिर्भक्तिरुपासना ॥ त्रयीज्ञेयं पवित्रं च पितामहपितामहः ॥ १९ ॥ ध्यान, ध्येय, स्तुति, स्तोत्र, नमस्कार, भक्ति, उपासना, वेदत्रयीसे जानने योग्य, पवित्र, पितामहके पितामह यह सब मैं हीहूं ॥ १९ ॥ ॐकार पावनः साक्षी प्रभुर्मित्रं गतिर्लयः ॥ उत्पत्तिः पोषको बीजं शरणं वा स एव च॥२०॥ ॐकार, पावन, साक्षी, प्रभु, मित्र, गति, लय, उत्पत्ति, पोषक, बीज, शरण ॥ २० ॥ असन्मृत्युः सदमृतमात्मा ब्रह्माहमेव च ॥ दानं होमस्तपो भक्तिर्जपः स्वाध्याय एव च२१॥ इसी प्रकार असत्, सत्, अमृत, आत्मा तथा ब्रह्म यह सब मैं ही हूं, दान, होम, तप, भक्ति, जप, वेदपाठ ॥२१॥ यद्यत्करोति तत्सर्वं समे मयि निवेदयेत् ॥ योषितोऽथ दुराचाराः पापास्त्रैवर्णिकास्तथा२२

भाषाटीकासमेत । ( ८३ ) यह जो कुछ भी करे सब मुझे निवेदन करदे मेरे आश्रय करनेवाले स्त्री दुराचारी पापी क्षत्रिय वैश्य शूद्रादि ॥ २२ ॥ मदाश्रया विमुच्यंते किं मद्भक्त्या द्विजातयः ॥ न विनश्यति मद्भक्तो ज्ञात्वेमा मद्दिभूतयः २३॥ यह भी तो मेरा आश्रय करनेसे मुक्त होजाते हैं फिर मेरे भक्तोंकी तौ बातही क्या है, मेरा भक्त यह मेरी विभूति जानकर कभी नष्ट नहीं होता है ॥ २३ ॥ प्रभवं मे विभूतीश्च न देवा ऋषयो विदुः ॥ नानाविभूतिभिरहं व्याप्य विश्वं प्रतिष्ठितः २४ मेरे प्रभव ( उत्पत्ति ) और मेरी विभूतियों को देवता और ऋषिभी नहीं जानते, मैं अनेक विभूतियोंसे विश्वमें व्याप्त होकर स्थित हूं ॥ २४ ॥ यद्यच्छ्रेष्ठतमं लोके सा विभूतिर्निबोध मे ॥२५॥ ॐतत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृ- तार्थशास्त्रे उत्त० श्रीगजाननवरेण्यसंवादे उपास- नायोगोनाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥

( ८४ ) गणेशगीता-अ० ८. जो जो इस लोकमें तेजयुक्त और श्रेष्ठतम हैं वह सब मेरी विभूति हैं ॥ २५ ॥ ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेश० योगामृतार्थशास्त्रे गजाननवरेण्य- संवादे पंडितज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायाम् उपासनायोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ वरेण्य उवाच । भगवन्नारदो मह्यं तव नाना विभूतयः ॥ उक्तवांस्ता अहं वेद न सर्वाः सोऽपि वेत्ति ताः १ वरेण्य बोले हे गणेशजी ! नारदजीके मुखसे मैंने तुम्हारी अनेक विभूति श्रवण की हैं उन्हें मैं जानताहूं, सब नहीं जानता, कारण कि सम्पूर्ण विभूति तो नारदजी भी नहीं जानते ॥ १॥ त्वमेव तत्त्वतः सर्वा वेत्सि ता द्विरदानन ॥ निजं रूपमिदानीं मे व्यापकं चारु दर्शय ॥ २ ॥ हे गजानन ! आपही उन सबको तत्त्वसे जानते हो, इस समय मनोहर और व्यापक आप अपना रूप मुझे दिखाइये ॥ २ ॥ श्रीगजानन उवाच । एकस्मिन्मयि पश्य त्वं विश्वमेतच्चराचरम् ॥ नानाश्चर्याणि दिव्यानि पुरा दृष्टानि केनचित् ३

३. अध्याय ७-१०: क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विवेक, त्रिगुण-विभेद, मोक्ष-योग व फलश्रुति

भाषाटीकासमेत । ( ८५ ) गणेशजी बोले राजन् ! इकले मुझहीमें तुम यह चराचर संसार देखो, और अनेक प्रकारके दिव्य आश्चर्य देखो जो पूर्वकालमें किसीनेही देखे हैं ॥ ३ ॥ ज्ञानचक्षुरहं तेऽद्य सृजामि स्वप्रभावतः ॥ चर्मचक्षुः कथं पश्येन्मां विभुं ह्यजमव्ययम् ॥४॥ मैं अपने प्रभावसे तुमको ज्ञाननेत्र देता हूं, कारण कि मुझ सर्वव्यापक अज अव्ययको चर्मचक्षु नहीं देखसक्ते ॥ ४ ॥ ब्रह्मोवाच । ततो राजा वरेण्यः स दिव्यचक्षुरवैक्षत ॥ ईशितुः परमं रूपं गजास्यस्य महाद्भुतम् ॥५॥ ब्रह्माजी बोले ! तब वह वरेण्य राजा गणेशजीके महा- अद्भुतरूप देखनेमें समर्थ दिव्य दृष्टिको प्राप्त होते हुए ॥ ५ ॥ असंख्यवक्त्रं ललितमसंख्यांघ्रिकरं महत् ॥ अनुलिप्तं सुगन्धेन दिव्यभूषाम्बरस्रजम् ॥ ६ ॥ असंख्य शोभायमान मुख, असंख्य हाथ, और सुगन्धिसे लिप्त, दिव्य भूषण वसन और मालासे शोभित ॥ ६ ॥ असंख्‍यनयनं कोटिसूर्यरश्मिधृतायुधम् ॥ तद्वर्ष्मणि त्रयो लोका दृष्टास्तेन पृथग्विधाः॥७॥

( ८६ ) गणेशगीता-अ० ८. असंख्य नेत्र, करोडों सूर्यकी किरणोंकी समान प्रकाशीत आयुध धारण किये, इस प्रकार उनके शरीरमें एक स्थानमें राजाने तीनोंलोक देखे ॥ ७ ॥ वरेण्य उवाच । दृष्ट्वैश्र्वरं परं रूपं प्रणम्य स नृपोऽब्रवीत् ॥ वीक्षेऽहं तव देहेऽस्मिन्देवानृषिगणान्पितॄन् ॥८॥ यह ईश्वरसम्बन्धी परम रूप देख प्रणाम करके राजा ( वरेण्य ) बोला-हे भगवन् ! मैं आपके इस देहमें देवता ऋषियोंके गण और पितरोंको देखता हूं ॥ ८ ॥ पातालानां समुद्राणां द्वीपानां चैव भूभृताम् ॥ महर्षीणां सप्तकं च नानार्थैः संकुलं विभो ॥९॥ हे विभो ! सात पाताल, सात समुद्र, सात द्वीप,सात पर्वत, सात ऋषि, यह सब अनेक अर्थोंसे युक्त देखता हूं ॥ ९ ॥ भुवोऽन्तरिक्षं स्वर्गांश्च मनुष्योरगराक्षसान् ॥ ब्रह्मविष्णुमहेशेन्द्रान्देवाअन्तूननेकधा ॥ १० ॥ पृथ्वी, अन्तरिक्ष, स्वर्ग, मनुष्य, सर्प, राक्षस, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इन्द्र,देवता और भी अनेकप्रकारके जन्तु देखता हूं १०॥

भाषाटीकासमेत । ( ८७ ) अनाद्यनन्तं लोकादिमनन्तभुजशीर्षकम् ॥ प्रदीप्तानलसंकाशमप्रमेयं पुरातनम् ॥ ११ ॥ अनादि, अनन्त लोकादि, अनन्त भुजा और शिरोंसे युक्त जलती हुई अग्निकी समान प्रकाशमान अप्रमेय पुरातन तुमको देखता हूं ॥ ११ ॥ किरीटकुण्डलधरं दुर्निरीक्ष्यं मुदावहम् ॥ एतादृशं च वीक्षे त्वां विशालवक्षसं प्रभुम् १२॥ किरीट कुंडल धारण किये सहजसे देखनेके अयोग्य आनन्ददायक चौडी छातीयुक्त हे प्रभो ! इस प्रकारका तुम्हारा रूप देखताहूं ॥ १२ ॥ सुरविद्याधरैर्यक्षैः किन्नरैर्मुनिमानुषैः ॥ नृत्यद्भिरप्सरोभिश्च गन्धर्वैर्गानतत्परैः ॥ १३ ॥ देवता, विद्याधर, यक्ष, किन्नर, मुनि, मनुष्य, नृत्य करती हुई अप्सरा, गान करते हुए गंधर्वोंसे तुम्हारा स्वरूप सेवित है १३ वसुरुद्रादित्यगणैः सिद्धैः साध्यैर्मुदायुतैः ॥ सेव्यमानंमहाभक्त्या वीक्ष्यमाणं सुविस्मितैः १४ आठ वसु, बारह आदित्योंके गण, सिद्ध, साध्य यह सब

( ८८ ) गणेशगीता-अ० ८. तुम्हारी सेवा करते, और महाभक्तिसे विस्मयको प्राप्त होकर आपको देखते हैं ॥ १४ ॥ वेत्तारमक्षरं वेद्यं धर्मगोप्तारमीश्वरम् ॥ पातालानिदिशःस्वर्गान्भुवंव्याप्याखिलंस्थितम् यह तुम्हें रूपके ज्ञाता, अक्षर, वेद्य ( जानने योग्य ) धर्मके रक्षक, ईश्वर, पाताल, दिशा, स्वर्ग, पृथ्वी इन सबमें व्यापक और ईश्वर जानते हैं ॥ १५ ॥ भीता लोकास्तथा चाहमेवं त्वां वीक्ष्य रूपिणम् । नानादंष्ट्राकरालं च नानाविद्याविशारदम् १६॥ हे भगवन् ! इस तुम्हारे रूपको देखकर सम्पूर्ण लोक तथा मैं भी डरगया हूं, यह आपका मुख अनेक तीक्ष्ण दाढोंसे भयंकर है आप अनेक विद्याओंके पार गन्ता हो ॥ १६ ॥ प्रलयानलदीप्तास्यं जटिलं च नभःस्पृशम् ॥ दृष्ट्वागणेश ते रूपमहं भ्रान्त इवाभवम् ॥ १७ ॥ प्रलयकी अग्निकी समान दीप्तिमान् तुम्हारा मुख है, जिसकी जटा आकाशको छूती है, हे गणेशजी ! आपका यह रूप देखकर मैं भ्रान्त हुआ हूं ॥ १७ ॥

भाषाटीकासमेत । (८९) देवा मनुष्या नागाद्याः खलास्त्वदुदरेशयाः ॥ नानायोनिभुजश्चान्ते त्वय्येव विशंति च १८ देवता मनुष्य नागादि और खल (दुष्ट) तुम्हारे उदरमें शयन करते हैं जो अनेक योनियोंको भोगकर अन्तमें तुममें प्रवेश करते हैं ॥ १८ ॥ अब्धेरुत्पद्यमानास्ते यथा जीमूतबिन्दवः ॥ त्वमिन्द्रोऽग्निर्यमश्चैव निर्ऋतिर्वरुणो मरुत् १९॥ जैसे सागरसे उत्पन्न हुए मेघके जलबिन्दु फिर उसीमें लीन होते हैं इसी कारण इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, तुमही हो ॥ १९ ॥ गुह्यकेशस्तथेशानः सोमः सूर्योऽखिलं जगत् ॥ नमामि त्वामतः स्वामिन्प्रसादं कुरु मेऽधुना २० कुबेर, ईशान, सोम (चंद्र) और सम्पूर्ण जगत् सब तुमही हो, हे स्वामी ! मैं तुमको नमस्कार करता हूं, अब आप मेरे ऊपर कृपा करो ॥ २० ॥ दर्शयस्व निजं रूपं सौम्यं यत्पूर्वमीक्षितम् ॥ को वेद लीलास्ते भूमन् क्रियमाणा निजेच्छया २१