गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८८ ) गणेशगीता-अ० ८. तुम्हारी सेवा करते, और महाभक्तिसे विस्मयको प्राप्त होकर आपको देखते हैं ॥ १४ ॥ वेत्तारमक्षरं वेद्यं धर्मगोप्तारमीश्वरम् ॥ पातालानिदिशःस्वर्गान्भुवंव्याप्याखिलंस्थितम् यह तुम्हें रूपके ज्ञाता, अक्षर, वेद्य ( जानने योग्य ) धर्मके रक्षक, ईश्वर, पाताल, दिशा, स्वर्ग, पृथ्वी इन सबमें व्यापक और ईश्वर जानते हैं ॥ १५ ॥ भीता लोकास्तथा चाहमेवं त्वां वीक्ष्य रूपिणम् । नानादंष्ट्राकरालं च नानाविद्याविशारदम् १६॥ हे भगवन् ! इस तुम्हारे रूपको देखकर सम्पूर्ण लोक तथा मैं भी डरगया हूं, यह आपका मुख अनेक तीक्ष्ण दाढोंसे भयंकर है आप अनेक विद्याओंके पार गन्ता हो ॥ १६ ॥ प्रलयानलदीप्तास्यं जटिलं च नभःस्पृशम् ॥ दृष्ट्वागणेश ते रूपमहं भ्रान्त इवाभवम् ॥ १७ ॥ प्रलयकी अग्निकी समान दीप्तिमान् तुम्हारा मुख है, जिसकी जटा आकाशको छूती है, हे गणेशजी ! आपका यह रूप देखकर मैं भ्रान्त हुआ हूं ॥ १७ ॥