गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( ८५ ) गणेशजी बोले राजन् ! इकले मुझहीमें तुम यह चराचर संसार देखो, और अनेक प्रकारके दिव्य आश्चर्य देखो जो पूर्वकालमें किसीनेही देखे हैं ॥ ३ ॥ ज्ञानचक्षुरहं तेऽद्य सृजामि स्वप्रभावतः ॥ चर्मचक्षुः कथं पश्येन्मां विभुं ह्यजमव्ययम् ॥४॥ मैं अपने प्रभावसे तुमको ज्ञाननेत्र देता हूं, कारण कि मुझ सर्वव्यापक अज अव्ययको चर्मचक्षु नहीं देखसक्ते ॥ ४ ॥ ब्रह्मोवाच । ततो राजा वरेण्यः स दिव्यचक्षुरवैक्षत ॥ ईशितुः परमं रूपं गजास्यस्य महाद्भुतम् ॥५॥ ब्रह्माजी बोले ! तब वह वरेण्य राजा गणेशजीके महा- अद्भुतरूप देखनेमें समर्थ दिव्य दृष्टिको प्राप्त होते हुए ॥ ५ ॥ असंख्यवक्त्रं ललितमसंख्यांघ्रिकरं महत् ॥ अनुलिप्तं सुगन्धेन दिव्यभूषाम्बरस्रजम् ॥ ६ ॥ असंख्य शोभायमान मुख, असंख्य हाथ, और सुगन्धिसे लिप्त, दिव्य भूषण वसन और मालासे शोभित ॥ ६ ॥ असंख्यनयनं कोटिसूर्यरश्मिधृतायुधम् ॥ तद्वर्ष्मणि त्रयो लोका दृष्टास्तेन पृथग्विधाः॥७॥