गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ९२ ) गणेशगीता-अ० ९. वरेण्य उवाच । अनन्यभावास्त्वां सम्यङ्मूर्तिमन्तमुपासते ॥ योऽक्षरं परमं व्यक्तं तयोः कस्ते मतोऽधिकः १॥ वरेण्य बोले हे भगवन् ! जो मूर्तिमान् तुमको अनन्यभा- वसे भजन करते हैं और जो अक्षर परम और व्यक्तरूपसे तुम्हारी उपासना करते हैं, उनमें अधिक कौन हैं ॥ १ ॥ असि त्वं सर्ववित्साक्षी भूतभावन ईश्वरः ॥ अतस्त्वां परिपृच्छामि वद मे कृपया विभो २॥ हे ईश्वर तुम सब जाननेवाले सबके साक्षी भूतभावन(जग- त्के उत्पन्न कर्त्ता ) ईश्वर हो इस कारण मैं तुमसे पूछताहूं. आप कृपाकर कहिये ॥ २ ॥ श्रीगजानन उवाच । यो मां मूर्तिधरं भक्त्या मद्भक्तः परिषेवते ॥ स मे मान्योऽनन्यभक्तिर्नियुज्य हृदयं मयि ३॥ श्रीगणेशजी बोले जो भक्तिपूर्वक मूर्तिधारी मेरी उपासना करता है, वह अनन्य भक्तिमान् हृदयमें मुझे धारण करनेवाला मेरा मान्य है ॥ ३ ॥