गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । (९३) खगणं स्ववशं कृत्वाखिलभूतहितार्थकृत् ॥ ध्येयमक्षरमव्यक्तं सर्वगं कूटग स्थिरम् ॥ ४ ॥ सम्पूर्ण इन्द्रियोंको अपने वशमें कर सब प्राणियोंका हित करता हुआ जो अक्षर और अव्यक्त, सर्वव्यापी कूटस्थ (निश्चल) स्थिर ब्रह्मका ध्यान करता है ॥ ४ ॥ सोऽपि मामेत्यनिर्देश्यं मत्परो य उपासते ॥ संसारसागरादस्मादुद्धरामि तमप्यहम् ॥ ५ ॥ वहभी जो अनिर्देश्य (जाति गुण क्रियासे) जाननेको अशक्य मेरी उपासना करता है उसको मैं संसारसागरसे उद्धार करता हूं ॥ ५ ॥ अव्यक्तोपासनादुःखमधिकं तेन लभ्यते ॥ व्यक्तस्योपालनात्साध्यं तदेवाव्यक्तभक्तितः ६॥ अव्यक्त ब्रह्मकी उपासना करनेवाले जनोंको अधिक क्लेश भोगना पडता है, जो व्यक्तस्वरूपकी उपासना भक्तिसे प्राप्त होता है, वही अव्यक्तकी भक्तिसे होता है ॥ ६ ॥ भक्तिश्चैवादरश्चात्र कारणं परमं मतम् ॥ सर्वेषां विदुषां श्रेष्ठो ह्यकिंचिज्ज्ञोऽपिभक्तिमान् ७