गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ९६ ) गणेशगीता-अ० ९. अहंकारका त्याग, ममता बुद्धिका न होना, द्वेष न करना, सबमें समान दृष्टि, लाभ अलाभ, सुख दुःख, मान अपमानमें एक दृष्टि रहे, सो मेरा प्यारा है ॥ १५ ॥ यं वीक्ष्य न भयं याति जनस्तस्मान्न च स्वयम् ॥ उद्वेगभीःकोपमुद्दीरहितो यः स मे प्रियः॥१६॥ जिसको देखकर किसी प्राणीका भय नहीं होता, और जो मनुष्योंसे शंकायुक्त नहीं होता है, उद्वेग और क्रोधके भयसे जो रहित हो वही मेरा प्रिय है ॥ १६ ॥ रिपौ मित्रेऽथ गर्हायां स्तुतौ शोके समः समुत्॥ मौनी निश्चलधीर्भक्तिरसंगः स च मे प्रियः १७ शत्रु मित्र निन्दा स्तुति शोकमें जिसका चित्त एक है मौनी, स्थिरचित्त, भक्तिमान्, असंग, ऐसाही प्राणी मेरा प्रिय है ॥ १७ ॥ संशीलयति यश्चैनमुपदेशं मया कृतम् ॥ स वंद्यःसर्वलोकेषु मुक्तात्मा मे प्रियःसदा १८॥ जो मेरे किये उपदेशको विचार करता है, वह त्रिलोकीमें नमस्कारके योग्य है और मेरा प्रिय है ॥ १८ ॥